रेस्टोरेंट में आग लगने के बाद बिलखाते रेस्टोरेंट मालिक सौरभ।
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रायल दरबार रेस्टोरेंट के गेट पर लगे मीटर बॉक्स से जब तड़तड़ाहट की आवाज के साथ चिंगारियां फूटीं तो बाहर सड़क से गुजर रहे लोग थमकर निहारने लगे। तब किसी को अंदाजा न था कि ये रेस्टोरेंट कुछ मिनटों में ही खाक हो जाएगा। बाहर गूंजती तड़तड़ाहट और छूटती चिंगारियों को देखने वालों की भीड़ बढ़ रही थी। इसी बीच भीतर से बदहवाश लोग भी बाहर आ गए। दो लोगों ने अग्निशमन यंत्र लेकर आग बुझाने की कोशिश की। पूरा सिलेंडर झोंक दिया, मगर गैस और धुएं के बीच आग थमी नहीं बल्कि फैलती गई। थोड़ी देर पहले जहां रायल दरबार रेस्टोरेंट अपनी भव्यता का अहसास करा था वहां अब राख और कालिख पुतीं दीवारें नुमायां थीं।
गुरुवार दोपहर 2.45 बजे, रायल दरबार रेस्टोरेंट ग्राहकों से आबाद था। अंदर संगीत की मद्धम धुन में लोग सुकून का अहसास कर रहे थे। ज्यादातर टेबल पर लोग व्यंजनों का लुत्फ ले रहे थे। वहीं एक टेबल पर बैठे कुछ युवा ऑर्डर देने के बाद सेल्फी खींचने में जुटे थे। सब अपनी रौ में खोए थे। तभी शीशे की ग्लास के फर्श पर गिरने की आवाज आई। सबका ध्यान आवाज की ओर गया। कुछ वेटर बाहर की ओर दौड़ते दिखे, उनमें से एक के हाथ से ग्लास छूटा था। इन्हीं वेटरों में से एक चीखा, ‘भागिए... आग लग गई है’। कुछ पल पहले जहां सुकून का आलम था, अब वहां अफरातफरी थी। उस वक्त रेस्टोरेंट में मौजूद करीब 35 लोगों में चार वर्षीय झुनझुन भी परिवारवालों के साथ बैठी थी। जब सब बाहर की ओर दौड़े तब भी वह कुर्सी पर बैठी चाउमिन खा रही थी। मां ने उसे कुर्सी से खींचते हुए साथ बाहर निकलने को कहा।
अब रेस्टोरेंट के भीतर मौजूद सभी लोग बाहर थे। मीटर बॉक्स से निकलती चिंगारी अब लपटों में तब्दील हो चुकी थी। लोग बिजली कटवाने के लिए उपकेंद्र पर फोन मिलाने लगे। 2.52 बजे बिजली काट दी गई। अब रेस्टोरेंट के सामने भीड़ जमा हो चुकी थी। इसी बीच रेस्टोरेंट के दो कर्मचारियों ने अग्निशमन यंत्र की पूरी गैस मीटर बॉक्स पर स्प्रे कर डाली, लेकिन आग कम होने की जगह और भड़क उठी। इस बीच कोई पानी तलाशता मिला तो कोई बालू। चंद मीटर के फासले पर मौजूद रामगढ़ ताल पुलिस चौकी की पुलिस फायरब्रिगेड को सूचना देने के बाद आसपास की इमारतें खाली कराने लगी। करीब आधे घंटे तक लोग आग बुझाने की कोशिश में जुटे रहे लेकिन लपटें अपना काम कर रही थीं। आधे घंटे बाद जब दमकल की दो गाड़ियां वहां पहुंची तब सामने बस राख का ढेर और स्याह पड़ी दर-ओ-दीवारें ही बची थीं।
बेबसी में रो पड़े, खाक हुई सारी जमा पूंजी
पहले हल्की दिख रही आग जब बढ़ने लगी तब रेस्टोरेंट के मालिक सौरभ का सब्र टूट गया। पहले सिर पर हाथ गया, फिर आंख नम हुई और लपटों के साथ सिसकियां तेज हो गईं। जब आग बेकाबू हुई तब सौरभ की चीखें निकलने लगीं। जार-जार रोते हुए सौरभ अपना सब कुछ फुंकने की बात कह रहे थे। बेहतर भविष्य की उम्मीद में उन्होंने सारी जमा पूंजी रेस्टोरेंट में लगा डाली थी, पर उन्हें क्या मालूम था कि उनकी आंखों के आगे ही उनका रेस्टोरेंट खाक हो जाएगा और वो बस बेबस बनकर उसे निहारते रह जाएंगे।