नदी में नहाते समय दोस्त को डूबने से न बचा पाने के सदमे में किशोर ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली। उसका शव उसी नदी के किनारे मिलने से हड़कंप मच गया। घटना शुक्रवार की रात चिलुआताल के बरियारपुर में हुई।
चिलुआताल प्रतिनिधि के मुताबिक बरियारपुर निवासी राधेश्याम सिंह अधिवक्ता हैं। उनका बेटा मृत्युंजय सिंह (18) शुक्रवार को उरुवा के अराव गांव निवासी रोहित सिंह (17) और राहुल के साथ नहाने गया था। पैर फिसलने से रोहित गहरे पानी में चला गया। मृत्युंजय ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, मगर कामयाब नहीं हो पाया। दोस्त का शव देखकर मृत्युंजय गुमसुम हो गया था। उसे लगने लगा कि उसकी वजह से रोहित की जान चली गई और वह कुछ नहीं कर सका। शुक्रवार को मृत्युंजय के पिता कचहरी गए हुए थे। मां भी घर पर नहीं थी। दोस्त का शव मिलने के बाद करीब दो बजे वह घर आया था और अपने भाइयों से यह कहकर निकल गया कि कहीं जा रहा है। देर शाम तक जब वह घर नहीं लौटा तो घरवाले उसकी तलाश में निकले। देर रात नदी किराने ही मृत्युंजय का शव मिला। आशंका जताई जा रही है कि मृत्युंजय ने जहरीला पदार्थ खाकर खुदकुशी कर ली है। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
परिस्थितियों से संघर्ष करना सिखाना होगा
गोरखपुर यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग की डॉ. अनुभूति दुबे मृत्युंजय की आत्महत्या के पीछे अपराधबोध से उपजे अवसाद की चरम स्थिति को देखती हैं। कहती हैं कि हो सकता है मृत्युंजय ने दोस्तों को नदी में नहाने के लिए प्रेरित किया होगा, इसलिए वह दोस्त की मौत के पीछे खुद को दोषी मान बैठा होगा। या फिर आंखों के आगे दोस्त को मरता देखकर अचानक उसका सामना जीवन की अनिश्चितता से हुआ होगा। सब नश्वर है, यह जानकर दोस्त को न बचा पाने के अफसोस में यह कदम उठा लिया होगा। इस तरह की प्रवृत्ति के पीछे परवरिश का भी अहम रोल है। हमें अपने बच्चों को कठिन से कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करना सिखाना होगा। जैसे कभी पेंसिल बनाते वक्त ब्लेड से उंगली कटने पर कुछ अभिभावक आसमान सिर पर उठा लेते हैं तो वहीं कुछ बच्चों को समझाते हैं कि हौसला रखो, मामूली चोट है जो ठीक हो जाएगी। पहली परिस्थिति में पला-बढ़ा बच्चा छोटी घटना में घबरा जाएगा तो दूसरी स्थिति में पला बच्चा घटना के बाद जल्द संभल जाएगा।