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लावारिस लाशों के दाह संस्कार की रकम नाकाफी

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अमर उजाला ब्यूरो
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गोरखपुर।
वर्दी की हनक कहें या मजबूरी, मगर लावारिस शव का दाह संस्कार वर्दी के रौब पर ही हो पाता है। लावारिस के कफन से लेकर दाह संस्कार की प्रक्रिया महज तीन सौ रुपये में ही की जाती है। सुनकर यह अचरज जरूर लग रहा होगा, मगर यह यूपी पुलिस ही है कि महंगाई के इस दौर में इतनी कम रकम में ही यह इंतजाम बड़े सलीके से कर जाती है। यही नहीं खून से सनी जिस लाश को देखकर ही लोग मुंह मोड़ लेते हैं, उसे कभी-कभी पुलिस को खुद ही उठाना पड़ता है। 2016 में पुलिस को ऐसी 296 लावारिस लाशें मिली थीं।
जिले में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता है, जब लावारिस लाश न मिलती हो। शव की पहचान न होने हो पाने पर कफन और अंतिम संस्कार करने का जिम्मा पुलिस का ही होता है। पुलिस शव को पोस्टमार्टम हाउस भेजती है और फिर उसे उसका अंतिम संस्कार करना होता है। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पुलिस को महज 300 रुपये ही मिलते हैं और यह रकम थानेदार की संस्तुति के बाद ही पुलिस लाइंस में प्रक्रिया पूरी कराने पर हासिल हो पाती है। अब इस रकम में दाह संस्कार कर पाना तो दूर कफन भी ले पाना संभव नहीं होता। पुलिस अपने हनक के दम पर ही यह काम कराती है। इसे लेकर कई बार सवाल भी खड़े हुए, मगर आज तक रकम नहीं बढ़ सकी है।
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2800 देने की हुई थी घोषणा, पर आदेश नहीं
करीब तीन साल पहले लावारिस लाशों के दाह संस्कार को लेकर 2800 रुपये दिए जाने की घोषणा हुई थी, मगर आदेश नहीं आ सका। इस कारण पुरानी व्यवस्था ही चल रही है। जो सिपाही इस रकम के लिए आवेदन करते हैं उन्हें यह रकम मिल भी जाती है और जो इस ओर ध्यान नहीं देते उन्हें पूरा खर्च खुद ही उठाना पड़ता है।
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पिकेट ड्यूटी के सिपाही को मिलती है जिम्मेदारी
लाशों के दाह संस्कार की जिम्मेदारी हमेशा पिकेट ड्यूटी के सिपाही को दी जाती है। हालांकि ऐसा कोई नियम नहीं है, मगर ऐसा दाह संस्कार का खर्च निकालने के लिए किया जाता है। सूत्रों की मानें तो पिकेट ड्यूटी के दौरान आने वाली रकम से ही दाह संस्कार कराया जाता है। यानी, जिस वसूली को लेकर पुलिस बदमाश है, उसी वसूली की रकम से लावारिस का दाह संस्कार होता है।
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नहीं आते हैं आवेदन
तीन सौ रुपये के लिए सिपाही को लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। लाश के अंतिम संस्कार के बाद उसके मिलने से लेकर पोस्टमार्टम, दाह संस्कार का खर्चा बताते हुए प्रार्थना पत्र तैयार करना होता है, फिर थानेदार की संस्तुति होती है, उसके बाद ही रकम मिल पाती है।
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पांच से आठ हजार रुपये आता है खर्च
हिंदी रिवाज से दाह संस्कार करने में लकड़ी से लेकर कफन और महापात्र खर्च मिलाकर आठ हजार रुपये आते हैं। वहीं मुस्लिम समाज में पांच हजार रुपये तक खर्च आ जाता है। यह सामान्य खर्च होते हैं।
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