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पापा ...किसी बच्चे को इतनी बड़ी सजा न देने को कहें

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गोरखपुर।
12 वर्षीय नवनीत प्रकाश की ये चिट्ठी थी उसके अभागे पापा को। इसके शब्द-शब्द उन्हें निशब्द करने को काफी थे। इसमें वो अंतहीन पीड़ा थी जो अब आजीवन रवि प्रकाश को सालती रहेगी। नवनीत ने मौत को अपने दर्द की दवा समझने की भूल कर दी और पूरे परिवार को ताउम्र रुलाने वाला गम दे गया।
छोटी उम्र में बड़ी सजा ने नवनीत प्रकाश का मनोबल तोड़ दिया था। परीक्षा के पहले दिन क्लास टीचर ने उसे जो सजा दी उसकी परिणति इतनी त्रासद होगी, ये उसके घर वालों ने सपने में भी न सोचा होगा। तीन पीरियड तक नवनीत को खड़ा रहने की सजा मिली थी। इसे उसने रो-रोकर पूरा किया था। इस सजा के पीछे उसने कुछ चापलूसों को दोष दिया था, जिनसे क्लास टीचर घिरी हुई थीं। बाल मन में यह भी डर था कि पापा उसकी बात पर यकीन न करें और शायद उन्हें टीचर की बात पर झट से विश्वास हो जाए। इसलिए पापा से बात करने की जगह नवनीत ने सुसाइड नोट को उनसे संवाद का जरिया बना डाला। इसमें सजा देने वाली टीचर की किसी भी बात पर यकीन न करने की अपील के साथ उसने फिर आपबीती बयां कर दी। अपनी मौत सोच बैठे नवनीत ने इसकी जानकारी देते हुए पापा सेे आखिरी इच्छा कह डाली। उसकी अंतिम इच्छा में अपने जैसे बच्चों के लिए चिंता भी छिपी थी। उसे डर था कि जैसा उसके साथ हुआ वैसा दूसरे बच्चों के साथ न हो। उसने पापा से अपील करते हुए लिखा कि ‘मेरी मैम को किसी बच्चे को इतनी बड़ी सजा न देने को कहें’। और फिर नवनीत पापा, मम्मी और दीदी को अलविदा बोल गया।
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नवनीत कहता था पापा मैं पीएम बनूंगा
नवनीत को घर की टीवी पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नजर आ जाते तब वह पापा से मोदी की तरह पीएम बनने की बात कहता। नवनीत के सपनों को जहां परवाज मिलनी थी वहीं पहुंचकर उसके ख्वाबों के पर कटने लगे। जो शिक्षक उसे मंजिल की राह दिखाता, उसकी संगत में नवनीत ने मौत का रास्ता चुन लिया। जहां उसकी जिंदगी में ज्ञान की रौशनी भरनी थी, वहीं उसके दिमाग में आत्महत्या का अंधेरा भर गया।

अब आंसुओं में डूबा परिवार
नवनीत के आत्मघाती कदम से पूरा परिवार आंसुओं में डूब गया है। कभी बहन पिछले माह की राखी याद कर चीख रही थी तो कभी मां सुनीता अपने लाडले को खोने के गम में रोते-रोते अचेत हो जा रही थीं। पिता रवि प्रकाश भी जार-जार रो रहे थे, लेकिन जब बेटी और बीबी की तड़प देखते तो अपने आंसू भूलकर उनके आंखें पोछने में जुट जाते। भीगी आंखों के साथ बीबी और बेटी को ढांढस बंधाना असर नहीं डाल पा रहा था।

जिसने भी पढ़ा वह रो पड़ा
पांचवीं के छात्र नवनीत प्रकाश के सुसाइड नोट ने स्कूल में टीचर से मिल रही प्रताड़ना की पूरी कहानी बयां की थी। इस चिट्ठी में कम उम्र में भी आत्म सम्मान की झलक थी। अकेले तीन पीरियड मेज पर खड़ा रखने की सजा से नवनीत टूट गया था। उसने बताया कि दो दिन की प्रताड़ना पत्र में लिख डाली लेकिन इस बात को अपने मां-बाप से कह न सका। घरवाले भी उसकी उदासी को समझ न पाए। मनोवैज्ञानिक भी अभिभावक और टीचर दोनों की सोच को इस घटना का दोषी बता रहे हैं।

भड़का गुस्सा, स्कूल में तोड़फोड़-पथराव
पांच दिन पहले नवनीत ने जहर खाया था लेकिन बुधवार को मौत के बाद सुसाइड नोट सामने आने के बाद परिजन भड़क गए। आसपास के लोग भी चिट्ठी पढ़कर रो पड़े। इसके बाद ही एकत्र हुए लोग स्कूल पहुंच गए और जमकर तोड़फोड़ की। गमले, शीशे तोड़ डाले मगर स्कूल प्रबंधक की ओर से कोई सामने नहीं आया। गुस्साए लोगों ने स्कूल पर तोड़फोड़ शुरू की तो वहां पर स्कूल स्टाफ के तीन लोग मौजूद थे। लोगों का गुस्सा देखकर वह भी फरार हो गए। उनकी ही सूचना पर आधे घंटे बाद पुलिस भी पहुंची मगर तब तक हंगामा करने वाले भी वहां से चले गए थे।

बढ़ता समाजिक दबाव और बच्चों की घटती क्षमता दोषी
बच्चों पर बढ़ते समाजिक दबाव की आलोचना की। इसके साथ ही बताया कि बच्चों की मांग अभिभावकों के जरिए तुरंत पूरी हो जाने से उसमें संघर्ष की प्रवृति तेजी से घटी है। 12 वर्ष का बच्चा योजना बनाकर आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठा सकता। वह इस तरह के आत्मघाती कदम का अंजाम नहीं जानता होगा। उसने डराने के लिए ऐसा कदम उठाया होगा। बच्चों पर बढ़ता सामाजिक दबाव और उनमें घटती संघर्ष की क्षमता उन्हें कमजोर बना रही है।
-प्रो. कीर्ति पांडेय, समाजशास्त्री गोरखपुर यूनिवर्सिटी
मोहनापुर में सब रोए
गोरखपुर। एकलौते बेटे नवनीत की मौत से पिता और मां का रो-रोकर बुरा हाल है। जिस किसी ने दोनों को बिलखते देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। मोहनापुर में मोहल्ले के लोगों को भी रोते देखा गया। सब कहते मिले कि नवनीत शांत स्वभाव का अच्छा बच्चा था। पढ़ने में तेज था, फिर भी क्लास टीचर ने प्रताड़ित किया। इससे टूटकर 12 साल के बच्चे ने आत्मघाती कदम उठा लिया। पादरी बाजार प्रतिनिधि के मुताबिक सब स्कूल प्रबंधन को कोस रहे हैं।
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बच्चों को प्यार से समझाएं
टेक्नोलॉजी और टीवी ने बच्चों को बड़ा बना दिया है। कम उम्र में ही बच्चों की सोच, समझ अच्छी हो जाती है। ऐसे में उत्पीड़न या फिर मारपीट से बच्चों का कोमल मन आहत हो जाता है। वह आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। इस संबंध में तमाम शोध भी हुए हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों से अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए। बाल शोषण से कुछ हासिल नहीं होगा। खास कर माता-पिता को बच्चों से रोज बात करनी चाहिए। यदि बच्चा गलत करे तो उसे प्यार से समझाना चाहिए। यदि डांट, फटकार पड़ी तो बच्चा तुरंत तनाव में आता है। यह स्थिति खतरनाक होती है।
- प्रो. सुषमा पांडेय, मनोविज्ञानी, गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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