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बीआरडी के छात्रावास में एमबीबीएस छात्र ने की आत्महत्या

Wed, 04 Apr 2018 01:02 AM IST
क्राइम डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर।
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सुमित सिद्धार्थ की फाइल फोटो। - फोटो : Amar Ujala
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बीआरडी मेडिकल कॉलेज के न्यू यूजी छात्रावास के कमरा नंबर 119 में मंगलवार की सुबह फंदे से झूलता छात्र का शव मिलने से सनसनी मच गई। रविवार की रात से ही छात्र के नजर न आने पर बगल के कमरे में रहने वाले साथी ने मंगलवार की सुबह उसका दरवाजा खटखटाकर आवाज दी। कोई जवाब न मिलने पर आसपास के कमरों के छात्र भी वहां जुट गए।
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सुबह नौ बजे दरवाजे के ऊपर लगी जाली से छात्रों ने झांककर देखा तो 2014 बैच के एमबीबीएस छात्र सुमित सिद्धार्थ का शव पंखे से लगे फंदे से लटक रहा था। छात्रों ने वार्डन को इसकी जानकारी दी। वार्डन डॉ. शहबाज अहमद और असिस्टेंट वार्डन डॉ. विनय सिंह ने प्राचार्य गणेश कुमार को और उन्होंने गुलरिहा थानाध्यक्ष और मेडिकल कॉलेज चौकी इंचार्ज को जानकारी दी। बाद में प्राचार्य ने पुलिस को लिखित देकर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने को कहा।

मकान नंबर 570/557 विराटनगर, आलमबाग लखनऊ निवासी सुमित सिद्धार्थ के पिता राजेंद्र प्रसाद को कॉलेज प्रशासन ने फोन से सूचना दी। राजेंद्र प्रसाद इलाहाबाद में एजी कार्यालय में तैनात हैं। वह गोरखपुर के लिए निकल चुके हैं। पुलिस ने जब कमरे का दरवाजा तोड़ा वहां दुर्गंध फैल गई। अनुमान लगाया जा रहा है कि सुमित सिद्धार्थ ने रविवार की देर रात में आत्मघाती कदम उठाया होगा। फोरेंसिक टीम ने कमरे का गहन निरीक्षण किया। एसपी सिटी ने भी तफ्तीश की। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। आत्महत्या का कारण डिप्रेशन माना जा रहा है। सोमवार को सुमित सिद्धार्थ का पैथोलॉजी का सप्लीमेंट्री पेपर था।
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तीन विषय में आया था सप्लीमेंट्री
गोरखपुर। एमबीबीएस छात्र सुमित सिद्धार्थ का तीन विषयों में सप्लीमेंट्री आया था। माइक्रोबॉयोलॉजी, फार्मा और पैथोलॉजी विषय में उसे पासिंग मॉर्क्स नहीं मिले थे। वह चिंता में था कि उसे इन विषयों की परीक्षा दोबारा पास करनी होगी।

परीक्षा में नहीं पहुंचा तो भी नहीं लिया संज्ञान
सुमित सिद्धार्थ की मौत आवासीय मेडिकल कॉलेज में विद्यार्थियों के प्रति संस्थान की जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े कर रही है। सुमित का शव मिलने से एक दिन पहले सोमवार को उसकी पैथोलॉजी की सप्लीमेंट्री परीक्षा थी, लेकिन वह नहीं पहुंचा। ड्यूटी पर मौजूद केंद्र प्रभारी ने उसके एडमिट कार्ड से मोबाइल नंबर लेकर उसे फोन किया। कॉल रिसीव न होने पर उन्होंने सुमित सिद्धार्थ को अनुपस्थित दर्ज कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। वार्डन ने भी रविवार की रात के बाद से सुमित के नजर न आने का कोई संज्ञान नहीं लिया।

साथी छात्रों के बीच यह चर्चा थी कि सुमित अवसाद में था तो वार्डन और परीक्षा केंद्र प्रभारी ने इसे अनदेखा क्यों किया। जिस मेडिकल कॉलेज में रोजाना अवसादग्रस्त सैकड़ों मरीजों की काउंसिलिंग होती है वहां समय रहते सुमित को काउंसिलिंग मिल जाती तो शायद वह आत्मघाती कदम न उठाता। परीक्षा केंद्र प्रभारी ने सुमित के परीक्षा में न आने पर फोन किया, लेकिन दो बार कॉल रिसीव न होने पर उन्होंने छात्रावास से उसके संबंध में जानकारी लेनी क्यों नहीं जरूरी समझी। यही नहीं, रविवार की रात से सुमित ने खुद को कमरे में बंद रखा था, लेकिन वार्डन ने भी उसकी सुधि नहीं ली।

डॉ. आरती के मामले में भी चूके थे जिम्मेदार
डॉ. आरती झा की आत्महत्या के मामले में भी जिम्मेदार चूक गए थे। पीजी स्टूडेंट अपने सीनियर को, सीनियर शिक्षक को और शिक्षक विभागाध्यक्ष को रोज की गतिविधियों की जानकारी प्रोटोकॉल में देते हैं। डॉ. आरती के मामले में जिम्मेदार इस प्रोटोकॉल का पालन करने में चूक गए थे। उसने पेट दर्द की बात कहकर जूनियर से इंट्राकैथ लगवाया। फिर एनिस्थिसिया का इंजेक्शन लगाकर मौत को गले लगा लिया। उसके पेट दर्द की शिकायत और इंट्राकैथ लगवाने की भनक जिम्मेदारों को डॉ. आरती की मौत के बाद लग पाई थी।

नहीं बन सकी काउंसिलिंग की व्यवस्था
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने डॉ. आरती की आत्महत्या पर विद्यार्थी और शिक्षकों के बीच बेहतर संवाद का माहौल तैयार करने की बात कही थी। दावा किया गया था कि इसके जरिये डिप्रेशन में गए स्टूडेंट को पहचाना जा सकेगा। इसके साथ ही उचित काउंसिलिंग देकर उसके जीवन और कॅरियर को सही राह भी दी जा सकेगी परंतु तत्कालीन प्रिंसिपल की ओर से शुरू की गई ये कवायद अंजाम तक नहीं पहुंच सकी।

बीआरडी के तत्कालीन प्राचार्य डॉ. पीके सिंह ने डॉ. आरती की मौत के बाद विभागाध्यक्षों से संवाद किया था। तब उन्होंने डिप्रेशन में गए स्टूडेंट से लेकर इसकी ओर बढ़ रहे छात्रों को चिह्नित करने के लिए विभागाध्यक्षों से सुझाव मांगे थे। प्राचार्य डॉ. पीके सिंह ने कहा कि संस्थान में संसाधन हैं। बस जरूरत सही कार्ययोजना बनाने की है। मनोविज्ञान विभाग के साथ मिलकर सभी विभागाध्यक्षों के सहयोग से डिप्रेशन के खतरे से घिरे विद्यार्थियों पर जल्द काम शुरू करने का उन्होंने दावा किया था। उन्होंने कहा था कि अक्सर मेडिकल स्टूडेंट पढ़ाई और परीक्षा को लेकर डिप्रेशन में चले जाते हैं तो वहीं पारिवारिक परेशानियों या निजी समस्याओं के चलते भी विद्यार्थियों के साथ ऐसी समस्या हो जाती है।

काउंसिलिंग उन्हें ऐसी स्थिति से उबारने का सबसे बेहतर उपाय है, लेकिन प्रिंसिपल के स्थानांतरण के बाद जिम्मेदार इस विषय को ही भूल गए। अगर यह कवायद अंजाम तक पहुंची होती तो शायद सुमित सिद्धार्थ की जान सलामत होती।

सुमित और आरती से पहले डिप्रेशन के ‘जहर’ से मरा था जफर
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में डिप्रेशन का जहर पहले भी जानलेवा साबित हो चुका है। सुमित सिद्धार्थ से चार माह पहले पीजी छात्रा डॉ. आरती ने भी अवसाद से घिरकर आत्महत्या की राह चुनी थी। अवसाद का यही जहर 1998-99 बैच के पीजी छात्र जफर की जान ले चुका है। कॉलेज से जुड़े पुराने लोगों के जेहन में इन घटनाओं की दुखद तस्वीर आज भी ताजा है। पुराने स्टाफ जफर की घटना के चश्मदीद रहे तो उन्होंने डॉ. आरती और सुमित की मौत भी देख ली। डॉ. आरती को छोड़कर सुमित और जफर का मौत को गले लगाने का तरीका एक जैसा ही रहा। इलाहाबाद निवासी पीजी स्टूडेंट डॉ. जफर ब्वॉयज हॉस्टल में रहता था। विनम्र स्वभाव का जफर किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था। उसके दोस्त कम थे और ज्यादातर वक्त वो क्लास और हॉस्टल के कमरे में ही गुजारता था। एक दिन उनकी लाश कमरे की छत के कुंडी से लगे फंदे में झूलती मिली। उस वाकये ने हॉस्टल के स्टूडेंट से लेकर स्टाफ तक को झकझोर दिया था। गैर समुदाय की एक छात्रा के साथ प्रेम संबंधों में डूबे जफर के भीतर कब डिप्रेशन का ‘जहर’ दाखिल होकर जानलेवा बन गया, यह बगल के कमरों में रहने वाले साथी भी नहीं जान सके।

सुमित की जान के साथ गुम हुई साथियों की मुस्कान  
गोरखपुर। एमबीबीएस छात्र सुमित सिद्धार्थ की जान जाने के साथ ही उसके साथियों की मुस्कान गुम हो गई। मंगलवार की सुबह उसका शव सामने आने के बाद न्यू यूजी हॉस्टल में सन्नाटा छा गया। कभी किसी पुलिस वाले की बूट का शोर तो कभी शव लेने आई एंबुलेंस ने इस सन्नाटे में थोड़ी हलचल पैदा की, लेकिन साथी को खोने वाले छात्रों के दिलों में जारी उथल-पुथल के आगे ये हलचल खामोश सी लगी। उनके चेहरों पर पसरे ‘सन्नाटे’ ने दिलो-दिमाग में छाए दुख और पीड़ा को बिन आवाज ही बयां कर दिया। न्यू यूजी हॉस्टल में छात्र की मौत से सदमे में आए कई विद्यार्थियों की हालत खराब नजर आई। कोई साथी की मौत से दुखी होकर सुबकने लगा तो कोई व्यथित होकर उल्टियां करने लगा। साथियों के बीच मौत का कारण जानने को लेकर भी बेचैनी दिखी।

एक और दो तारीख के बीच रात में हुई दूसरी मौत
गोरखपुर। सुमित सिद्धार्थ का शव भले ही तीन अप्रैल की सुबह सामने आया, लेकिन परिस्थितियां इशारा कर रही थीं कि उसने यह कदम एक और दो अप्रैल के दरम्यान रात में उठाया होगा। चार माह पहले इसी एक और दो तारीख के दरम्यान रात में गायनी विभाग की पीजी छात्रा डॉ. आरती झा ने भी आत्मघाती कदम उठाया था। मामले दोनों तनाव के थे।
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