पत्नी का हाथ थामे जेल से बाहर आते चौथी यादव।
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बेलीपार के मलाव गांव निवासी 105 साल के बुजुर्ग कैदी चौथी यादव गुरुवार को मंडलीय कारागार से रिहा हो गए। उन्हें हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। चौथी यादव के घर वालों ने उनकी उम्र को देखते हुए राज्यपाल से दयापूर्वक रिहाई की मांग की थी। राज्यपाल ने दया याचिका स्वीकार करते हुए रिहाई का आदेश भी दे दिया था, लेकिन जेल प्रशासन की लापरवाही के कारण 18 मार्च के इस आदेश पर गुरुवार को अमल हो सका। चौथी यादव को लेने पहुंचीं पत्नी सुनारा देवी ने माला पहनाकर उनका स्वागत किया। इसके बाद वह उनसे लिपटकर रोने लगीं।
हत्या के एक मामले में चौथी यादव को सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 2003 में उन्हें जेल भेजा गया था। यह मामला एक जनवरी 2017 को राज्यपाल राम नाईक के पास पहुंचा। उन्होंने चौथी की उम्र देखते हुए दया याचिका स्वीकार कर ली और उन्हें रिहा करने का आदेश दे दिया। वैसे तो चौथी यादव की रिहाई का आदेश 18 मार्च को ही पहुंच गया था, लेकिन जेल प्रशासन की लापरवाही के कारण रिहाई की औपचारिकताएं पूरी नहीं हो सकीं। इस बीच चौथी यादव के घर वालों ने फिर पैरवी की तो गुरुवार को देर शाम चौथी यादव को रिहा कर दिया गया।
करीब 14 साल जेल में बिताने के बाद रिहा हुए चौथी यादव को लेने उनकी पत्नी सुनारा देवी पहुंची थीं। पति को देखते ही वह उनसे लिपटकर रोने लगीं। चौथी भी भावुक हो गए। दोनोें एक-दूसरे का हाथ पकड़े घर की ओर रवाना हो गए। चौथी की रिहाई की पैरवी बेटे जीत बंधन और रिश्तेदार गौतम यादव ने की।
रिश्तेदारी में हुई हत्या में दोषी पाए गए थे चौथी
उरुवा में 1979 में चौथी की रिश्तेदारी एक हत्या हुई थी। इस मामले में पीड़ित परिवार ने चौथी यादव समेत चार लोगों को आरोपी बनाया था। हाईकोर्ट से तो चौथी यादव को राहत मिल गई लेकिन पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। वहां 2003 में हुई सुनवाई में चौथी यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।