गोंडा। जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम ने जिले के एक प्रतिष्ठित सर्जन के खिलाफ दर्ज परिवाद को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। फोरम ने आदेश में कहा कि मामले में परिवादी की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य अपर्याप्त हैं, इसलिए चिकित्सक पर इलाज में लापरवाही का मामला नहीं बनता।
जिले के सदर तहसील क्षेत्र के ग्राम चौरी हरसोपट्टी पोस्ट महादेवा चकसड़ निवासी राम सरन शुक्ला ने जिला उपभोक्ता फोरम में परिवाद दायर किया। अर्जी में कहा कि बीते 17 जून 2018 को सीने में दर्द होने पर ददुवा बाजार बड़गांव स्थित किरन हास्पिटल एंड लेप्रोस्कोपिक सेंटर पहुंचा।
संचालक डॉ. मनोज कुमार सिन्हा के यहां वह इलाज कराने गया और निर्धारित पांच सौ रुपए फीस देकर दिखाया। डॉ. मनोज की सलाह पर दो हजार पांच सौ रुपए देकर एक्सरे और पैथालॉजी टेस्ट कराया। रिपोर्ट डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने ऑपरेशन की सलाह दी। इसके बाद 18 जून 2018 को ऑपरेशन का दो लाख जमा कराकर उन्होंने चेस्ट का ऑपरेशन किया।
20 जून को डिस्चार्ज कर पांच दिन की दवा दी। इसके बाद परेशानी होने पर कई बार उन्हें दिखाया तो वह दवा देते रहे। लेकिन परिवादी के ऑपरेशन के दौरान लगाए गए टांके सड़ गए और घाव हो गया। करीब ढाई माह तक इलाज के बाद डाक्टर मनोज सिन्हा ने उसे केजीएमयू मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। डाक्टर के सही इलाज न करने से परिवादी को तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ा। परिवादी ने जिला उपभोक्ता संरक्षण फोरम में याचिका दाखिल कर डाक्टर की असावधानीपूर्वक की गई चिकित्सा से उसे दो लाख 30 हजार रुपये व शारीरिक और मानसिक क्षति के लिए पांच लाख रुपये क्षतिपूर्ति दिलाने की मांग की।
फोरम की नोटिस पर चिकित्सक डॉ. मनोज कुमार सिन्हा ने हाजिर होकर अपना उत्तर पत्र दाखिल किया, जिसमें उन्होंने ऑपरेशन व इलाज करना स्वीकार किया। लेकिन परिवाद को दोषपूर्ण बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग की। सुनवाई के दौरान पेश किए गए साक्ष्य के आधार पर फोरम ने माना कि परिवादी यह साबित करने में विफल रहा है कि चिकित्सक की असावधानी, ऑपरेशन व इलाज से उसे क्षति हुई है। परिवादी की शिकायत पर क्षय रोग अधिकारी डॉ. एके उपाध्याय की जांच में भी विपक्षी डाक्टर को दोषी न पाए जाने पर फोरम ने माना कि साक्ष्य के अभाव में परिवाद निरस्त किए जाने योग्य है।
मामले में निर्णय सुनाते हुए फोरम के अध्यक्ष रामानन्द, सदस्य सुभाष सिंह व श्रीमती मंजू रावत ने परिवाद को निरस्त कर दोनों पक्षों को वाद व्यय स्वयं वहन करने का आदेश दिया।