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कारगिल विजय : सामने थी मौत, शरीर छलनी हुआ मगर लड़ते रहे

Fri, 26 Jul 2024 01:05 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
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पूर्व सैनिक विजय सिंह कारगिल। स्रोत: सोशल मीडिया
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गोंडा। कारगिल युद्ध में भारत के वीर जवानों ने पाकिस्तानी सेना को परास्त कर विजय का झंडा बुलंद किया था। दुश्मनों के छक्के छुड़ाने और देश की आन, बान, शान के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर जिले के विजय सिंह लगातार लड़ते रहे। उनका पूरा शरीर गोलियों से छलनी हो गया। वीर सपूत विजय सिंह की जान तो बच गई पर वह हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए। उनका एक पैर भी छोटा हो गया।
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60 दिन तक चला कारगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 को खत्म हुआ था। इसमें पाकिस्तान के खिलाफ भारत की विजय हुई थी। कारगिल के ही एक हीरो विजय सिंह हैं। जिनके साहस और हौसले की कहानी लोगों को हैरान कर देती है। दो गोलियां और बम के टुकड़े लगने से शरीर छलनी था। आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था। मगर गोलियां लगने के बावजूद अपने प्राणों की परवाह नहीं की। उन्होंने हार नहीं मानी और देश की रक्षा के लिए फायरिंग जारी रखी थी। इस युद्ध में उनका एक पैर जख्मी हो गया। तीन साल तक इलाज चला। जिससे उनकी जान तो बच गई लेकिन वह हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए।
तरबगंज तहसील क्षेत्र के बेलसर ब्लाॅक अंतर्गत ऐली-परसौली गांव में 1970 में जन्मे विजय सिंह की बचपन में ही सेना में जाने की इच्छा थी। वर्ष 1988 में जब लखनऊ में सेना भर्ती मेला लगा तो वह सेना में भर्ती हो गए। जिस समय कारगिल में पाक से युद्ध शुरू हुआ तो वह बारामूला में 16 ग्रेनेडियर रेजिमेंट में बतौर नायक तैनात थे। एमएमजी, एजीएल व एके 47 का प्रशिक्षण प्राप्त विजय सिंह को यूनिट के साथ द्रास सेक्टर भेजा गया।
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विजय बताते हैं कि कारगिल हिल के पास टाइगर हिल के सामने और नीचे की ओर द्रास सेक्टर है। नौ जून 1999 को कारगिल में भीषण युद्ध शुरू हुआ। विजय बताते हैं कि कमांडिंग ऑफिसर व दल नायक मेजर अजीत सिंह के नेतृत्व में उनकी यूनिट ने पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। एक माह की लड़ाई में उनकी यूनिट के 12 जवान शहीद हो गए। 22 जवान जख्मी हुए। 5100 नंबर की पहाड़ी पर निर्णायक युद्ध चल रहा था। पहाड़ी के नीचे उनकी यूनिट के जवान फायरिंग कर रहे थे और वह पहाड़ी पर चढ़ रहे थे। उनके बगल में कवर फायरिंग के लिए प्रयागराज के जवान अमर बहादुर भी थे। विजय ने बताया कि पहली गोली उन्हें घुटने के नीचे लगी तो कुछ नहीं पता चला, बस एक ही संकल्प था कि साथी को तो खो दिया लेकिन पहाड़ी को लेकर ही रहेंगे। वह आगे बढ़े ही थे कि दूसरी गोली भी उनके घुटने के नीचे लगी तो पैर में कुछ चिपचिपाहट महसूस हुई। जब तक वह कुछ समझ पाते तब तक एक बम फटा और फिर आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। इसके बावजूद लड़ाई जारी रखी और सात बार दुश्मनों पर फायर किया, लेकिन पैर में गोली लगने से हुए रक्तस्राव से उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। साथी हिम्मत बंधाते रहे मगर कुछ देर में ही वह बेहोश हो गए और 12 से 14 घंटे तक उसी पहाड़ी पर पड़े रहे। होश आया तो श्रीनगर अस्पताल में थे। जबकि उनके साथी अमर बहादुर सिंह व जाट रेजिमेंट का एक साथी शहीद हो गया था।
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