फोटो-11 गोंडा में जिला अस्पताल के इमरजेंसी के बाहर लगा छोटा फायर सेफ्टी सिलेंडर। -संवाद
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गोंडा। जिला महिला अस्पताल में फायर सेफ्टी के इंतजाम सालों पुराने उपकरणों के भरोसे हैं। अचानक हादसा हो जाने पर यहां का फायर सेफ्टी सिस्टम छह साल पुराने अग्नि शमन यंत्रों के भरोसे है। इससे अस्पताल में आने वाली प्रसूताओं के साथ ही नवजात की जिंदगी भी दांव पर रहती है। लखनऊ के एक होटल में हुए जानलेवा अग्निकांड के बाद अग्नि सुरक्षा से जुड़े मानकों का सख्ती से अनुपालन कराने के निर्देश के बाद भी जिले के जिम्मेदार अभी तक इससे अंजान बने आंखें मूंदे हैं। इसी कारण महिला अस्पताल में लगे फायर सेफ्टी के उपकरण महज शोपीस बने नजर आते हैं। अस्पताल में लगे अग्निशमन रोधी सिलिंडर भी एक्सपायर हो चुके हैं।
महिला अस्पताल में वर्ष 2016 में लगाए गए इन अग्निरोधी सिलिंडरों को न तो अस्पताल प्रशासन की ओर से रिफिल कराया गया और न ही अग्निशमन विभाग ने इसकी जांच करना मुनासिब समझा। ऐसे में अचानक हादसा होने पर इन एक्सपायर सिलिंडरों से आग बुझाना कही से भी संभव नहीं हो पाएगा। इतना ही नहीं जिला अस्पताल व सीएमओ कार्यालय में भी फायर सेफ्टी से जुड़े इंतजाम पूरी तरह हाशिए पर हैं। जिला अस्पताल में इमरजेंसी के बगल व कुछ अन्य स्थानों पर एक दो छोटे सिलेंडर लटकाकर मानकों की खानापूर्ति कर दी गई जबकि सीएमओ कार्यालय पर तो सिलेंडर ढूंढे नजर नही आता है।
मॉकड्रिल न होने से स्टॉफ अंजान
जिला अस्पताल व महिला अस्पताल में कार्यरत कर्मचारियों व अन्य स्टॉफ को आपात काल के दौरान फायर सेफ्टी से जुड़े जरूरी उपकरण संचालित करने की कोई जानकारी नहीं है। अग्नि शमन विभाग द्वारा सरकारी अस्पतालों में आज तक कोई प्रशिक्षण या मॉकड्रिल नहीं कराई गई है। इस कारण मौजूद सिलिंडर इत्यादि को प्रयोग में लाने तक की जानकारी से कर्मचारी व बाकी स्टॉफ पूरी तरह अंजान है। नियमानुसार अस्पतालों में समय-समय पर आगजनी की घटनाओं से बचाव के तौर तरीके सिखाने के लिए मॉकड्रिल का आयोजन जरूरी है। इससे फायर सेफ्टी को लगे उपकरणों की जांच के साथ ही स्टॉफ को भी प्रशिक्षित करने का कार्य होता है। इसके बावजूद दोनों ही बड़े सरकारी अस्पतालों में कई सालों से आग लगने के हादसे से बचने के इंतजाम परखने को कोई मॉकड्रिल नहीं हुई है।
हर साल होनी चाहिए सिलेंडर की जांच
हादसे के समय आग बुझाने में प्रयोग आने वाले फायर सेफ्टी सिलेंडरों ही हर साल जांच करवाना जरूरी होता है। इसके आधार पर जरूरत पड़ने पर इन्हें रिफिलिंग करवाया जाता है। उपयोग में लाए जाने वाले यह फायर सेफ्टी सिलिंडर तीन श्रेणी में आते हैं। इनकों 18 महीने से लेकर तीन साल के अंदर बदलना जरूरी होता है।
जिले में फायर सेफ्टी सिस्टम की जांच करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। टीमें होटलों, अस्पतालों व दुकानों पर जाकर लगे उपकरणों व उनकी वैधता की जांच कर रही हैं। जांच में एक्सपायर सिलिंडर या अन्य सेफ्टी उपकरण पाए जाने पर संबंधित प्रतिष्ठान संचालक पर कार्रवाई भी तय होगी। राम सुमेर तिवारी, मुख्य अग्निशमन अधिकारी