गोंडा। कैसरगंज सांसद बृजभूषण शरण सिंह के भतीजे सुमित भूषण सिंह की गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। शहर के सिविल लाइंस इलाके में कूटरचित दस्तावेज तैयार कर नजूल की भूमि खरीदने व कब्जाने के मामले में सुमित आरोपी हैं। हाईकोर्ट में शुक्रवार को फिर मामले की सुनवाई होगी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर कर बैनामे को वास्तविक व्यक्तियों से खरीदने का सुमित के अधिवक्ता ने दावा किया है। उन्होंने नजूल निरीक्षक रघुनाथ तिवारी की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर को चुनौती देते हुए रद्द करने की भी मांग की।
बुधवार को दाखिल याचिका के बाद राज्य सरकार, उत्तर प्रदेश पुलिस व अन्य को नोटिस जारी हुई। गुरुवार को बेंच ने सुनवाई के बाद सुमित भूषण सिंह की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए शुक्रवार को फिर केस की सुनवाई के लिए तारीख निर्धारित की है। जस्टिस रंजन राय और जस्टिस नरेंद्र कुमार जौहरी की बेंच ने यह आदेश दिया। जनवरी माह में प्रशासन ने राजस्व कर्मियों की सूचना पर सिविल लाइंस में तीन एकड़ भूमि पर बाउंड्री बनाकर कब्जे पर कार्रवाई की।
उस समय बाउंड्री ढहा दी और मामले की जांच कराई। बीती चार फरवरी को नगर कोतवाली में सुमित भूषण सिंह के साथ ही जमीन का बैनामा करने वाले आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर नगर कोतवाली में दर्ज हुई। एफआईआर को सुमित भूषण सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी। रिट पिटीशन - 1287/2023 की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता जेएन माथुर और सहयोगी सर्वेश कुमार तिवारी ने कोर्ट के समक्ष सुमित भूषण का पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता के तौर पर सतीश चंद्र कशिश ने इनका विरोध किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता माथुर ने कहा कि सुमित वास्तविक खरीदार हैं और नजूल भूमि के मूल पट्टेदार के नाम को दर्शाने वाले दस्तावेज हैं। जांच अधिकारी, जो व्यक्तिगत रूप से मौजूद हैं, उनका कहना है कि उन्होंने इसमें प्रक्षेप यानि हेराफेरी है। अधिवक्ता ने कहा है कि यदि यह एक दीवानी विवाद है, तो याचिकाकर्ता की ओर से कोई आपराधिक कृत्य शामिल नहीं है, जो वास्तविक खरीदार है।
उन्होंने यह भी कहा कि एफआईआर में यह उल्लेख किया गया है कि विक्रेताओं के नाम जमीन नहीं है। जबकि 1370 फसली (वर्ष 1963) के लिए खतौनी राजस्व रिकॉर्ड में विक्रेता का नाम है। 1940 में ही पट्टा उनके पक्ष में निष्पादित हो चुका था, लेकिन अब इस न्यायालय के समक्ष आज कहा जा रहा है कि अभिलेखों में भले ही नामों का उल्लेख है, लेकिन कुछ हेराफेरी है। इस तरह का बदलाव यह दर्शाता है कि एफआईआर बगैर जांच व उचित रिकॉर्ड के मामला दर्ज किया गया है।