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Gonda News: दुर्गा पूजा पंडालों में सजेंगी इको फ्रेंडली प्रतिमाएं

Sun, 22 Sep 2024 11:48 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
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गोंडा के नूरामल मंदिर के पास मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण में जुटा कारीगर। - संवाद
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गोंडा। शारदीय नवरात्र में दुर्गा प्रतिमा तैयार करने की तैयारियां तेज हो गई हैं। प्लास्टर ऑफ पेरिस की जगह इस बार इको फ्रेंडली प्रतिमाओं की मांग बढ़ गई है। जिले में बहराइच रोड, गल्ला मंडी रोड व स्टेशन रोड पर आठ-दस स्थानों पर बंगाल के मूर्तिकारों की टोलियां दुर्गा प्रतिमाएं बनाकर उन्हें संवारने में लगे हैं। इसके स्थानीय मूर्तिकार भी मदद कर रहे हैं।
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बहराइच रोड पर मारुति चौराहा के पास भारतीय मूर्ति कला केंद्र के व्यवस्थापक सोहनलाल ने बताया कि इस वर्ष प्लास्टर ऑफ पेरिस की जगह इको फ्रेंडली प्रतिमाओं की मांग बढ़ गई है। अब तक 60 प्रतिमाओं की बुकिंग हुई है। प्रधान मूर्तिकार जीवनलाल ने बताया कि जिले में 50 से 60 प्रजापति व अन्य परिवार पर्व के अनुरूप दुर्गा, लक्ष्मी, गणेश आदि प्रतिमाएं बनाने का कार्य पुश्तैनी रूप से कर रहे हैं। प्रतिमा बनाने में सबसे ज्यादा प्रयोग खड़िया मिट्टी का होता है। जिससे प्रतिमा में किसी प्रकार का कोई निशान या खरोंच न आए। इस कार्यशाला में सबसे छोटी 4.5 फीट और देवीपाटन मंडल की सबसे बड़ी 21 फीट ऊंची प्रतिमा तैयार की जा रही है। यह प्रतिमा शहर के पीपल चौराहे पर स्थापित की जाएगी। पांच हजार से 50 हजार रुपये तक की प्रतिमाएं तैयार की गई हैं।
प्रतिमाएं बनाने में प्रयोग होने वाले कच्चे माल की कीमत रंग-ओ-रोगन व मजदूरी की दर बढ़ने से पांच से दस हजार की छोटी प्रतिमाओं में 70 प्रतिशत और उसके ऊपर विशेष सजावट प्रतिमाओं में 60-65 प्रतिशत तक लागत आती है। मूर्तिकार को चार-पांच माह के रोजगार के बाद अन्य कामों में मेहनत मजदूरी कर वर्ष भर गुजारा करना पड़ता है।
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दुर्गा मंदिर के पास अपनी कार्यशाला में प्रतिमा का चेहरा संवार रहे कोलकाता के मूर्तिकार हरुपाल ने बताया कि प्रतिमा में चेहरा बनाने के लिए मिट्टी, शृंगार सामग्री व अन्य सामान कोलकाता से लाया जाता है। उनके यहां एक दर्जन मूर्तिकार और पांच सहायक मिलकर जून से सितंबर तक चार माह में 200 प्रतिमाएं तैयार करते हैं। यहां छह से दस फीट तक प्रतिमाएं 10 हजार से 30 हजार रुपये में उपलब्ध हैं। दो-तीन महीने पहले से ही बुकिंग के लिए लोग आने लगते हैं।
मूर्तिकार ने बताया कि प्रतिमाओं को तालाब की मिट्टी, जूट, नारियल, सन, भूसा, धान की भूसी, पुआल, बांस, लकड़ी से तैयार किया जा रहा है। वहीं प्रतिमाओं की रंगाई के लिए भी खड़िया मिट्टी, गेरू व हल्के रंगों का प्रयोग किया जा रहा है। जिससे विसर्जन के बाद पानी में किसी भी तरह की अशुद्धि व संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। मिट्टी का प्रयोग भी उसकी गुणवत्ता परखने के बाद किया जाता है। एक साथ पांच-दस प्रतिमाओं पर काम शुरू करने पर उसे अंतिम रूप देने में पांच से दस दिन तक समय लगता है।
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