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Ghazipur News: रंगों के गढ़ को लगी नजर, लाल-हरा नहीं बस अनदेखी का काला रंग - A

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सैदपुर के रंगों से चमकते थे सैकड़ों लोगों के घर-परिवार, होली आते ही गंगा भी हो जाती थीं रंगीन
संवाद न्यूज एजेंसी
औड़िहार। रंगों के त्याेहार पर जहां लाेगों के मनमिजाज में उल्लास और मस्ती छा जाती है वहीं यहां के रंग उद्योग पर दर्द का काला रंग छा जाता है। हो भी क्यों ना चार दशक पूर्व सैदपुर का जो रंग उद्योग पूरे उत्तर भारत में न केवल अपनी पहचान बनाए हुए था, बल्कि पड़ोसी देशों नेपाल, सिक्किम, तिब्बत एवं भूटान तक में यहां के बने रंगों की खपत जो होती थी। आलम ये था कि रंग के कारखानों में प्रात: आने वाले मजदूरों का हुजूम जब दोपहर में भोजन से पूर्व गंगा स्नान के लिए विभिन्न घाटों पर एक साथ पहुंचता था तब गंगा कई किलोमीटर तक रंगीन हो जाती थी।न सिर्फ रंग के व्यापारी बल्कि इससे जुडे़ लोग खुशहाल थे। लेकिन रंग कारोबार के फीका पड़ते ही सब कुछ बदल गया।

रंग उद्योग से चमकते थे यहां के हजारों लोग
उस जमाने में प्रतिमाह लाखों का टर्नओवर होली के कई माह पहले से शुरु हो जाता था। क्षेत्र और आसपास इलाके में रहने वाले हजारों लोगों की जीविका भी यहां के रंग उद्योग के बदौलत मजे से चलती थी। लेकिन समय के बदलते परिवेश में यहां का रंग उद्योग अब सिमट चुका है। इसके बावजूद होली नजदीक आते ही यहां का रंग उद्योग चमकने लगता है। कुटीर उद्योग के स्थान पर मशीनों का वर्चस्व स्थापित हो जाने के बावजूद यहां का स्थानीय रंग उद्योग अपने छोटे पैमाने पर ही सही अभी भी कायम है । भारतीय परंपराओं में होली यदि रंगों का त्योहार है तो सैदपुर के रंग की अमिट छाप होली के उल्लास की भांति लोगों के मन में कुछ इस तरह समाई है कि उसके मुकाबले में किसी दूसरी जगह का रंग उन्हें चढ़ता ही नहीं ।
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मिठाइयों में भी हाेता था यहां के रंगों का प्रयोग
प्रदेश के कोने-कोने से यहां के रंगों की मांग बसंत पंचमी के पूर्व से ही होने लगती है । एक समय था जब कपड़े रंगने, बेल बूटे बनाने और छपाई करने का काम कस्बे में रंगरेजों द्वारा होता था। तब यहां का रंग उद्योग अपने चरम पर था। सैदपुर के रंगों के साथ पुड़िया वाले नील की मांग इस कदर थी कि औड़िहार जंक्शन और सैदपुर रेलवे स्टेशन का माल गोदाम भर जाता था। दोनों रेलवे स्टेशनों से इसे दूर दराज के इलाकों और राज्यों में भेजा जाता था। इतना ही नहीं उन दिनों मिठाइयों में भी सैदपुर के निर्मित रंग का प्रयोग हुआ करता था। खासतौर से इमरती, लड्डू, बर्फी बनाने में इसका उपयोग शहरों से लगायत्त गांवों के मिठाई के दुकानदार किया करते थे। खाद्य की दृष्टि से यहां का निर्मित रंग अनुकूल माना जाता था। रंग की छोटी पुड़िया भरने का काम घरों में महिलाएं करती थी तो उनके पुरुष कागज के डिब्बों में उसकी पैकिंग करने फिर उसकी बड़ी गांठ बनाने का काम किया करते थे।
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उद्योग को लगा अनदेखी का ग्रहण
उद्यमी सुदर्शन, प्रकाश कुमार गुप्ता, रतन, राजेंद्र , सीमा देवी आदि यहां के रंग बदहाली की चर्चा पर बताते हैं कि सूती कपड़ों की जगह जींस सेंथेटिक और अन्य कपड़ों ने ले ली है। मशीन द्वारा रंगीन कपड़े एवं साड़ियाें का काम हो रहा है। पुड़िया वाले रंग की मांग कुछ विशेष अवसर तक ही रह गई है। कुटीर उद्योग होने के बावजूद सरकार द्वारा इसके लिए कोई सुविधा अथवा प्रोत्साहन नहीं है। वैट की मार अलग से है। श्रमिकों का बड़े शहरों की ओर पलायन होना तथा यहां संसाधनों का अभाव उद्योग में गिरावट का कारण है। किसी जमाने में लाखों में होने वाले रंग उद्योग पर ऐसी मार पड़ी कि उसके भरोसे जिंदगी बसर करनी मुश्किल है। एक जमाने में लाखों में होने वाला कारोबार अब हजारों में सिमट गया है।
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