गाजीपुर। गाजीपुर वीरों की धरती मानी जाती है। यहां के जवान देश की आन-बान और शान के लिए प्राणों की आहुति देने में कभी पीछे नहीं रहे। हर वर्ष अगस्त आते ही लोगों के जेहन में जंग-ए-आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों का संघर्ष याद आने लगता है। लोग 1942 की उस लड़ाई को याद करने लगते हैं, जब मुल्क अंग्रेजों का गुलाम था। इसे गुलामी की जंजीरों से निकालने के लिए क्रांतिकारियों को अपने प्राण तक न्योछावर करने पड़ गए। ऐसी ही गर्व महसूस कराने वाली घटनाओं के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं।
शाम को पानी में भिगो दिया जाता था कोड़ा, सुबह उसी से होती थी क्रांतिकारियों की पिटाई
15 अगस्त 1942 को एक बड़ा विद्रोह सादात में हुआ था। सादात थाने के तत्कालीन प्रभारी सब इंस्पेक्टर हमीदुल्लाह खां और सिपाही वली मुहम्मद को जिंदा जला दिया गया था। क्रांतिकारी अलगू अहीर शहीद हो गए। कालांतर में जिंदा जलाए गए दोनों पुलिस कर्मियों की मजार आज भी है। उस समय सैकड़ों क्रांतिकारी पकड़कर जेलों में ठूंस दिए गए थे। जेल में कैदियों को प्रतिदिन सौ कोड़े और सौ बेंत की सजा मिलती थी। बेंत को शाम को पानी में भिगो दिया जाता था और सुबह उससे पिटाई होती थी। इसके बाद इन क्रांतिकारियों को प्रतिदिन 15 से 30 किलो अनाज चाकी (चक्की) से पीसने की सजा मिलती थी। लगभग 5 साल तक कैद की सजा काटने के बाद जब देश ब्रिटिश शासन से मुक्त हुआ, तब उन्हें जेल से आजाद किया गया।
कतार में खड़े करके क्रांतिकारियों को मार दी थी गोली
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के करो या मरो के नारे के साथ नंदगंज में भी अगस्त क्रांति का बिगुल बज गया था। यहां के क्रांतिकारियों ने 18 अगस्त 1942 को नंदगंज के थाने पर धावा बोला। नंदगंज स्टेशन पर खड़ी 52 डिब्बों की मालगाड़ी को लूट लिया था। अंग्रेजी सेना ने पश्चिमी रेलवे क्रॉसिंग गेट से मोर्चाबंदी करके क्रांतिकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी। लोगों को कतार में खड़ा करा कर गोली मार दी गई। इस घटना में 100 से अधिक लोग शहीद हो गए और सैकड़ों घायल हो गए थे। 175 चक्र गोलियां चलाने के बाद पुलिस की गोलियां समाप्त हो गई और पुलिस अधीक्षक फोर्स के साथ वहां से भाग गया। करीब एक हफ्ते तक वहां अंग्रेजी सरकार का कोई नामोनिशान नहीं रहा। वहीं, अंग्रेज पुलिस के डर से कोई अपने सगे-संबंधियों के शव उठाकर अंतिम संस्कार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। पुलिस ने कई गांवों में आग लगा दी थी।
तिरंगा फहरा रहे क्रांतिकारियों को गोली मार रहे थे अंग्रेज, आठ जवान हुुए थे शहीद
आजादी के दीवानों ने 16 अगस्त को गौसपुर हवाई अड्डे को तहस नहस कर दिया था। मुहम्मदाबाद पोस्ट ऑफिस को फूंक दिया था। शेरपुर शहीद बाग से दो हजार से ज्यादा युवकों की टोली मुहम्मदाबाद की तरफ चली। इनमें कुछ नाव से तो कुछ तैरते हुए आए। आगे जाने के बाद 18 अगस्त को तहसील भवन के पीछे से तहसील परिसर में दाखिल हुए। लेकिन, तब तक सामने की तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई थी। इस समय तहसील भवन पर तिरंगा फहराते समय एक के बाद एक जवान गोली लगने से गिरते गए। देखते ही देखते भारत मां के आठ लाल शहीद हो गए।
थाने को कब्जे में लेकर फहरा दिया था तिरंगा
महात्मा गांधी के आह्वान पर 15 अगस्त 1942 को सरजू पांडेय के नेतृत्व में कासिमाबाद थाना परिसर में आग लगाकर हजारों क्रांतिकारियों ने थाने को कब्जे लेकर तिरंगा लहरा दिया था। तब पूरा क्षेत्र जश्न के माहौल में डूब गया था। थाने में लूटपाट और आगजनी की घटना के बाद उन लोगों पर थाना फूंकने के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। मुकदमे में सरजू पांडेय सहित 16 लोगों को विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई गई थी। इसमें छह लोगों को कठोर कारावास की सजा हुई थी। सरजू पांडेय ही एकमात्र ऐसे अभियुक्त थे, जिन्होंने सीना चौड़ा करते हुए थाना जलाने में अपनी भूमिका को स्वीकार किया था लेकिन लूटपाट करने से इन्कार कर दिया था।