रमजान का आखिरी अशरा जहन्नुम से आजादी का बुधवार से शुरू हो गया। मगरिब की नमाज से पहले लोग मस्जिदों में पहुुंच कर एतिकाफ में बैठ गए। जो अब 10 दिन बाद ईद का चांद देख कर ही घर लौटेंगे। रमजान को 10-10 दिन के तीन हिस्सों में बांटा गया है। जिन्हें अशरा कहते हैं। इन में पहला दस दिन रहमत का, दूसरा दस दिन मगफिरत का और तीसरा था अंतिम दस दिन जहन्नुम से आजादी का है। रमजान के इस अंतिम 10 दिनों में लोग मस्जिदों में तन्हा रहकर अल्लाह की इबादत करते हैं। उन्हें बाहर की दुनिया से कुछ भी लेना देना नहीं होता है। बस अल्लाह का राजी करना और अपनी गुनाहों की माफी कराना ही मकसद होता है। इसी के तहत बुधवार को शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों की मस्जिदों में लोग एतिकाफ में बैठे। वह अपना सभी रोजाना के जरूरी सामान लेकर मगरिब की नमाज से पहले मस्जिद पहुंच गए। कुछ मस्जिदों में एतिकाफ पर बैठने वालों के लिए सहर और इफ्तारी के इंतजाम किए जाएंगे जबकि कुछ लेागों के घरों से खाने पीने के सामान भेजे जाएंगे। मौलाना सालिम अबु नस्र बताते हैं कि एतिकाफ का मतलब इबादत की नीयत से 10 दिन तक मस्जिद में या किसी तन्हां जगह सुदा की इबातद में गुजारना। बताया कि माहे रमजान में अल्लाह तआला बंदों पर रहमतों की बारिश कर देता है। उसी बारिश की एक कड़ी एतिकाफ भी है जो हमें अल्लाह के करीब ले जाती है। कहा कि एतकाफ बंदे व अल्लाह के बीच का फासला कम करता है। यहीं वह मौका है जब बंदा अपने रब को राजी कर सकता है। बंदे के पास अल्लाह की बारगाह में रोने गिड़गिड़ाने का खूब मौका मिलता है। बकौल मौलाना, एतिकाफ में बैठने वाला पूरे दस दिन दुनियावी झंझटों से दूर हो जाता है। तमाम बुराइयों, गलतियों, गुनाहों से बच जाता है।