संवाद न्यूज एजेंसी
बहरियाबाद। माहे मुहर्रम का चांद बुधवार को दिखाई देने के साथ ही अकीदतमंदों विशेष रूप से शिया समुदाय के लोगों ने गम का प्रतीक स्याह लिबास धारण कर लिया। इसके साथ ही मजलिस-ओ-मातम का दौर प्रारंभ हो गया। या अली या हुसैन या अब्बास की सदाएं बुलंद होने लगीं।
हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे शोहदाए कर्बला हजरत इमाम हुसैन और उनके जानिसार साथी जिन्होंने इस्लाम के लिए शहादत तो कुबूल की लेकिन यजीदी फौज के आगे घुटने न टेके। मुहर्रम के महीने में यौमे आशूरह यानी दस मुहर्रम को मैदाने कर्बला में यजीदी लश्कर के हाथों इमाम आली मकाम शहीद कर दिए गए।
इनसे पहले इनके कई अजीज शहीद किए जा चुके थे। सात मुहर्रम से ही इन पर पानी बंद कर दिया गया था। नहरे-फोरात पर पहरे लगा दिए गए थे। तीन दिन भूखे प्यासे रहते हुए इमाम शहीद हो गए लेकिन यजीद की बैयत कुबूल न की। इन्हीं शोहदाए कर्बला की याद में अकीदतमंद विशेष रूप से शिया समुदाय के लोग मुहर्रम के महीने में इन्हें नम आंखों से याद करते हैं।
इसी क्रम में बुधवार को स्थानीय कस्बा के उत्तर मुहल्ला एवं दक्षिण मुहल्ला के अखाड़ों में फातिहाख्वानी की गई। इसके बाद उत्तर मुहल्ला स्थित चौक से शमीमुलवरा के नेतृत्व में जुलूस निकाला गया। जुलूस के दौरान नौहाख्वानी, मातम एवं सीनाजनी की गई। इस दौरान लोग या अली या हुसैन या अब्बास हाए सकीना की सदाएं बुलंद करते हुए चल रहे थे।