- अंतिम बार सन 1989 में मठिया मैदान से 150 युवाओं की हुई थी भर्ती
- लगभग हर घर से हैं लोग सेना में भर्ती
- 9.5 किमी में है गांव, डेढ़ लाख की है आबादी
अंकुर शुक्ला
गाजीपुर। मैं गहमर गांव हूं। मोक्षदायिनी गंगा के पावन तट और मां कामाख्या के आंचल में बसने के कारण लोग मुझे वीरता, साहित्य एवं आपसी सौहार्द का एक बेमिसाल उदाहरण भी मानते हैं। बिहार-उत्तर प्रदेश की सीमा पर मेरा फैलाव 9.5 किमी में 789.5150 हेक्टेयर क्षेत्रफल में है। गांव में कुल 32 मौजा है। आबादी करीब 1.50 लाख है और मौजूदा समय में 29 हजार से अधिक मतदाता हैं।
गांव में घुसते ही आपको घरों के बाहर लगी नेम प्लेट पर भूतपूर्व सैनिक, भारतीय सेना और फौजी जैसे शब्द दिखाई देंगे। वजह मेरी माटी में जन्म लेने वालों में देशभक्ति का जुनून अलग होता है, जिसके चलते हर परिवार का कोई न कोई व्यक्ति सेना में है या रह चुका है। लोग मुझे सैनिकों का गांव, एशिया के सबसे बड़े गांव के भी नाम से जानते हैं। हर रोज सुबह चार बजे मां गंगा के किनारे मेरे मठिया मैदान पर युवाओं के आगमन के साथ ही सन्नाटा खत्म होता है। एक-एक कर युवाओं के कदम मैदान में पड़ने शुरू होते हैं। थोड़ी देर बाद अच्छी खासी संख्या में युवा इकट्ठा होते हैं, यह सिलसिला कोई नया नहीं है। यकीन नहीं तो इतिहास के पन्ने पलट सकते हैं। क्योंकि देश का प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध हो या वर्ष 1965 या फिर वर्ष 1971 का युद्ध या कारगिल की लड़ाई, यहां के फौजियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। विश्व युद्ध के समय में अंग्रेजों की फौज में गहमर के 228 सैनिक शामिल थे। इनमें 21 शहीद हो गए थे। इनकी याद में गांव में एक शिलालेख लगा है। यहां के युवकों की फौज में जाने की परंपरा के कारण ही सेना यहां ही भर्ती शिविर लगाया करती थी। आज भी आर्मी की हार्डकोर प्रैक्टिस में शामिल होने वाली सभी तरह की सुविधाएं यहां मौजूद हैं। अंतिम बार 1989 में मठिया मैदान से बंगाल रायफल के कर्नल राम सिंह आकर 150 युवाओं को भर्ती कर ले गए थे। इसके बाद से यहां भर्ती बंद है। ऐसे में अब यहां के लड़कों को सेना में भर्ती होने के लिए बाहर जाना पड़ता है, फिर भी यहां के युवाओं का जज्बा कम होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है। यह बताते हुए गर्व हो रहा कि इस गांव के करीब 15 हजार लोग सेना में तैनात है, जबकि करीब दस हजार सेवानिवृत्त हैं। इसमें से काफी लोग शहरों में रह रहे हैं। गांव में शायद ही कुछ घर बचा होगा, जिस परिवार में कोई सैनिक न हो। युवाओं के लिए सैनिक भर्ती की तैयारी के लिए दो मैदान बुलाकीदास बाबा मठिया और डुबुकिया बाग है। सबसे अधिक युवा मठिया ग्राउंड में तैयारी करते हैं।
यही नहीं, इस गांव से कई साहित्यकार भी निकले, जिन्होंने देश का मान बढ़ाया। इतना ही नहीं, यहां के लोगों के सौहार्द की एक मिसाल यह भी है कि आजादी के बाद देश में चाहे जितने सांप्रदायिक दंगे हुए हो, कभी भी इस क्षेत्र में इसका असर नहीं हुआ। यहां लोग मिलजुल कर रहते हैं। युद्ध हो या प्राकृतिक आपदा, यहां की महिलाएं पुरुषों को मदद करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
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मां कामाख्या की है विशेष कृपा
गहमर में स्थित मां कामाख्या की सैनिकों पर काफी कृपा रही है। उन्हीं के आशीर्वाद के कारण गहमर क्षेत्र के सैनिक काफी कम संख्या में हताहत होते हैं। यही कारण है कि क्षेत्र का प्रत्येक सैनिक अपनी तैनाती स्थल से आने व जाने के पहले मां कामाख्या के दर्शन पूजन करना नहीं भूलते हैं। गहमर क्षेत्र में पैदा होने वाले प्रत्येक बच्चे का 3,5,7,9 वर्ष की आयु में इसी मंदिर में ही मुंडन संस्कार होता है।
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सरकार को भी पांव पीछे खींचने को कर दिया विवश
यहां की बढ़ती आबादी और बड़े क्षेत्रफल के कारण वर्ष 1978 में गहमर को तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने टाउन एरिया घोषित कर दिया था, लेकिन शासन एवं ग्राम सभा के बीच टकराव हो गया। यहां के लोगों ने काफी लड़ाई लड़ी। रेल रोको आंदोलन भी किया, जिसमें गोली चलाने का आदेश दे दिया गया। उस दौरान कई लोग घायल हुए। बाद में यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। वहां शासन की हार हुई और गहमर पुनः सन् 1994 में ग्राम सभा घोषित कर दिया गया। सन् 1995 में चंद्रावती देवी गहमर की प्रधान बनीं। इसी तरह, दूसरी घटना कुछ वर्ष पहले तब हुई थी, जब सेवराई नई तहसील बनीं। उस समय गांव दो हिस्सों में बांटने की कवायद शुरू हुई। इसकी सुगबुगाहट से ही विरोध के स्वर उठने लगे और अंत में शासन-प्रशासन ने निर्णय वापस ले लिया।
गांव में शहर जैसी सारी सुविधाएं हैं। गहमर में एक रेलवे स्टेशन है, जो पटना और मुगलसराय से जुड़ा है। गांव में टेलीफोन एक्सचेंज, बालिका इंटर कॉलेज, कई प्राथमिक विद्यालय, इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज, स्वास्थ्य केंद्र हैं।