गाजीपुर। मानव होने के नाते लोगों के मौलिक अधिकार हैं। जिसकी जानकारी हर किसी को होनी चाहिए । अधिकारों का संरक्षण करने के साथ पुलिस को भी मर्यादाओं में काम करना होता है। हरेक व्यक्ति को मूलभूत अधिकार जन्म से, संविधान के मूलभूत अधिकार और राज्य के नीति निदेशक तत्व (डीपीएसपी) द्वारा दिया गया है। इसके मुताबिक किसी व्यक्ति या एजेंसी को व्यवहार करना होता है। इसी के मद्देनजर साल 1950 में 10 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस घोषित किया। ये बातें जनपद के पुलिस अधीक्षक ओमबीर सिंह ने कही।
उन्होंने कहा कि पिछले दिनों जनपद में जो वीडियो वायरल हुआ। उसमें सामाजिक स्तर पर थूक चटवाने का वाकया सामने आया। ये मानवाधिकार के खिलाफ है। इसी क्रम में उन्होंने आइपीसी और सीआरपीसी को लेकर कहा कि यह दंड प्रक्रिया है। इसमें अपराध, कोर्ट, कचहरी, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम और प्रशासन कैसे काम करेगी, इस बारे में बताया गया है। जिससे पूरी पुलिस व्यवस्था संचालित होती है। इसका सीधे मानवाधिकार से संबंध नहीं है। कई बार दंड प्रक्रिया के दौरान मानवाधिकार सीमित से हो जाते हैं, लेकिन खत्म नहीं होते।
मानवाधिकार को लेकर जेल अधीक्षक हरिओम शर्मा का कहना है कि भारत में कैदियों की कोई संहिताबद्ध अधिकार नहीं हैं। हमारी न्यायपालिका ने समय समय पर विभिन्न मामलों में स्पष्ट किया है कि कैदी भी मौलिक अधिकार के हकदार हैं। हालांकि उनके मौलिक अधिकारों को युक्तिसंगत रूप से सीमित किया जा सकता है। जेलों में बंद कैदियों के कुछ बुनियादी अधिकार जिसमें भोजन, पानी, स्वास्थ्य, स्वच्छता, खुद का बचाव करने के लिए कानूनी सहायता, यातना, हिंसा एवं नस्लीय उत्पीड़न आदि से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कारागार प्रशासन पूर्णतया प्रतिबद्ध व सजग है।
मानवाधिकार दिवस का अर्थ
मानवाधिकार मतलब किसी भी इंसान को जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार से है। मानवाधिकार दिवस मनाने की शुरूआत संयुक्त राष्ट्र ने की। ये घोषणा 1948 में की गई थी लेकिन इसे मनाने के लिए महासभा ने सभी देशों को 1950 में आमंत्रित किया। जिसके बाद ये दिन मानवाधिकारों की रक्षा करने और उसे बढ़ावा देने के लिए तय कर दिया गया है।
भारत में इस काननू को लगी देर
भले ही संयुक्त राष्ट्र ने 1950 में सभी देशों को इस दिन को मनाने के लिए आमंत्रित किया हो लेकिन भारत में मानवाधिकार कानून को अमल में लाने के लिए एक लंबा वक्त लगा। हमारे देश में 28 सितंबर 1993 को मानवाधिकार कानून अमल में आया जिसके बाद इसी दिशा में कदम आगे बढ़ाते हुए 12 अक्टूबर 1993 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया।