गाजीपुर। शोधार्थी हरिप्रिया राय ने कहा है कि लोकगीतों मेें दुखों का मार्मिक चित्रण मिलता है। साथ ही लोकगीत का रचनाकार अपने व्यक्तित्व को लोक समर्पित कर देता है। वह राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से आयोजित शोध श्रृंखला की तीसरी कड़ी में बोल रही थीं। ‘भोजपुरी लोक साहित्य में अभिव्यक्त नारी जीवन : विशेष संदर्भ गाजीपुर’ शीर्षक पर अपने शोध निष्कर्ष को विषय विशेषज्ञ उदयभान यादव और लोक साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. रामनारायण तिवारी के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि सामान्यत: लोक में प्रचलित, लोक द्वारा रचित एवं लोक के लिए गाए जाने वाले गीत को लोकगीत कहा जाता है। उन्होंने कहा कि लोकगीत में उसके सुख-दु:ख का बड़ा मार्मिक चित्रण मिलता है। गाजीपुर के लोकगीत पूर्वांचल के अन्य जिलों में गाए जाने वाले लोकगीतों से भिन्न हैं। प्रो. रामनारायण तिवारी ने कहा कि लोक गीतों में जो स्त्री संबंधी दु:ख है वह सिफ़ॱर नई स्त्रियों के लिए है। पुरानी स्त्रियों के पास सत्ता का सुख है। डॉ. उदयभान ने कहा कि हर जाति का अपना गीत है। इसलिए लोक का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। शोध छात्रा को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि लोक साहित्य ही असली साहित्य है जो किसी दूसरे के लिए बुना, या रचा नहीं जाता है। कार्यक्रम का संयोजन असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. निरंजन यादव ने किया। इस दौरान डॉ. संगीता मौर्य एवं सभी छात्राएं उपस्थित रहीं। महाविद्यालय के मीडिया प्रभारी डॉ. शिवकुमार ने आभार जताया।