मौधा। धान की बुवाई का समय आ गया है। वैज्ञानिक तरीके से खेती कर किसान कम लागत में अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं। धान की खेती के पहले खेत को समतल करना होगा। फिर गहरी जुताई करनी होगी। ऐसे में खेत में न ही खरपतवार की झंझट रहेगी और न ही ज्यादा पानी लगेगा। कृषि वैज्ञानिक शिवशंकर सिंह बताते हैं कि रबी की फसल की कटाई के बाद से मई के अंत तक खेतों की जुताई का सबसे अच्छा समय है। वजह तय अवधि में जुताई करने पर फसलों की पैदावार 50 फीसदी वैसे ही बढ़ जाती है। गर्मियों में गहरी जुताई करने से खेतों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। इस कारण फसलों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। खेत में आठ से 30 सेमी तक गहरी जुताई कराने से खर पतवार नष्ट हो जाते हैं। बताया कि जुताई के पूर्व खेतों में हरी खाद अवश्य डालें। तीन से साढ़े तीन सौ क्विंटल हरी खाद महज 50-55 दिनों में मात्र पांच हजार की लागत में तैयार हो जाती है। जबकि इतनी ही गोबर की खाद लगभग 25-30 हजार में तैयार होती है। इसके अलावा 100 से 110 दिन में फसल प्राप्त करनी हो तो नरेंद्र-1, 2, 97, 80, 118 एवं गोविंद बरानीदीप प्रजाति के बीज डालें। वहीं 125-135 दिनों में फसल पाने के लिए नरेंद्र-359, 2064, 2065, 2026 आदि प्रजातियां उपयोगी हैं। जबकि सबसे अधिक दिनों 140 से 150 दिनों में फसल देने वाली प्रजातियां महसूरी, एमटीयू 7029 सुगंधित धान टाइप -3, नरेंद्र लालमती, काला नमक (केएन-3) आदि हैं। शिवशंकर सिंह ने बताया कि पहली विधि में हमें धान के खेत को भी गेहूं के खेत की तैयार करना होगा। इसके बाद जीरो ट्रिल मशीन से धान की बुवाई की जाती है। इस तरह की बुवाई में एक हेक्टेयर खेत में 30 से 35 किलो बीज लगता है। जबकि दूसरी विधि में लेव लगाकर ड्रमसीडर से बुवाई की जाती है। इसमें बीज अंकुरित रहता है। इसमें रोपाई का खर्च बच जाता है। साथ में पैदावार भी अधिक मिल जाती है। जुताई के बाद उसे लेवल लैंड लेजर से बराबर कर लेना चाहिए। इसमें पानी की 25 प्रतिशत बचत हो जाती है। इसमें धान के कल्ले भी एक साथ निकलते हैं।