गाजीपुर। जिले की मिट्टी खुद ही बीमार है जिसका असर सीधे पैदावार पर पड़ रहा है। मिट्टी में कार्बन की मात्रा जो 0.8 प्रतिशत होनी चाहिए वह 0.2 प्रतिशत है। इसके अलावा नाइट्रोजन, फास्फोरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, बोरान, पोटाश, जिंक आदि तत्व जो पोषक का काम काम करते हैं, इनकी भी कमी बनी हुई है। कृषि विभाग की ओर से तहसीलवार मृदा परीक्षण कराया गया। मृदा में फसल की उपज के लिए जो भी जरूरी तत्व है मात्रा के हिसाब से वह असंतुलित है। यह आगे आने वाली खेती और उपज के लिए यह एक गंभीर खतरा है। रबी, खरीफ, दलहन, तिलहन, अनाज, सब्जी या उद्यान आदि सभी प्रकार की फसलों के उत्पादन पर पोषक तत्वों के असंतुलन का बड़ा असर पड़ रहा है। इसमें रासायनिक खाद का प्रयोग भी बड़ा कारण है। रासायनिक खाद में सिर्फ फसल के हिसाब से ही आवश्यक तत्व होते हैं जो उस अनाज को तो उपजा देते हैं लेकिन इसके अन्य रसायन मृदा को बहुत हानि पहुंचा देते हैं। आंकड़ों की मानें तो आगे आने वाले 15 वर्ष में जिले की उपज क्षमता में पचास फीसदी तक कमी हो सकती है। इस खतरे से बचने के लिए गोबर के जैविक, कंपोस्ट और वर्मी खाद के प्रयोग पर जोर देना होगा। घरों में ही कम मेहनत की सबसे उत्तम खाद तैयार हो जाती है। इसमें सभी पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा होती है। आज के जागरूक किसान ही कल की खेती को बचा पाएंगे। उप कृषि निदेशक यूपी सिंह ने कहा कि उर्वर क्षमता घटना आगे एक गंभीर समस्या बन सकती है। रासायनिक खादों के प्रयोग को कम कर वर्मी कम्पोस्ट खाद को अपनाया जाना चाहिए। इस योजना पर सरकार 75 फीसदी का अनुदान भी दे रही है।