जमानिया। रंगों का पर्व होली भी बदलाव से अछूता नहीं है। फागुन लगते ही हंसी-ठिठोली, उल्लास और अल्हड़न का माहौल अब गायब हो गया है। न तो फाग के बोल सुनाई देते और न हुड़दंग मचातीं युवाओं की टोलियां दिखतीं। होली के रंग, फगुआ गीत, गुझियां, पापड़, चिप्स बनाने के साथ सुरीले कंठ से आंगन में फाग गातीं महिलाएं जैसे नजारों को आधुनिकता ने चौपट कर दिया। प्रेम-मुहब्बत तथा भाईचारे के इस पर्व पर हर गलती माफ हो जाती थी। मान मनुहार जैसे छोटे-छोटे मामले कचहरी की तारीखें बनने लगे हैं। हिंदू पीजी कालेज जमानिया के पूर्व प्राचार्य डॉ. अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि हमें गांवों को बचाना होगा। अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाना होगा। उनका कहना है कि पहले की होली और अब में बहुत बदलाव आता जा रहा है। पहले हर सदस्य परिवार के बीच त्योहार मनाना पसंद करते थे। बाहर रहने वाले लोग होली के समय अपने घर जरूर आ जाते थे। लोग कोसों पैदल और कच्ची सड़क से चलकर घर पहुंचते थे। अब साधन होने के बावजूद आपसी मतभेद के चलते घर आने की जहमत नहीं उठाते। परिवेश बदला, समय बदला और होली का स्वरूप भी बदल गया। अपनों के बीच त्योहार का वह आनंद नहीं दिखता। इसी प्रकार महाविद्यालय के प्रबंधक लछिराम सिंह यादव का कहना है कि पहले होली के लिए तैयारी एक माह पूर्व शुरू हो जाती थी। घर की महिलाएं होली के लिए आलू के चिप्स, पापड़ और गुझिया समेत तरह-तरह के पकवान बनाने के लिए पहले से ही तैयारी करने लगती थीं। होली के दिन मिलने का अंदाज ऐसा होता था कि जैसे सब मनमुटाव भूल बिसर गए हों। सबकी दिल से आवभगत होती थी लेकिन समय के साथ वह प्रेम तथा होली के रंग नदारद होते जा रहे हैं।