रंगों के पर्व होली के आने पर सैदपुर के रंग उद्योग की याद आ जाना स्वाभाविक है। करीब पांच दशक पहले आसपास के जिलों और प्रदेशों में ही नहीं बल्कि नेपाल, तिब्बत एवं भूटान में यहां के बने रंगों की धूम थी। क्षेत्र एवं आसपास के गांव में रहने वाले सैकड़ों महिला एवं पुरुषों की जीविका इस उद्योग की बदौलत आसानी से चल रही थी लेकिन समय के साथ बदलते परिवेश में यहां का रंग उद्योग अब सिमट चुका है। आज से लगभग पांच दशक पहले सैदपुर का रंग उद्योग अपने चरम उत्कर्ष पर था। 1960 के दशक में इस रंग उद्योग की शुरुआत सैदपुर नगर के आत्मा नगर में बंबई कलर एजेंसी के नाम से पंडित बनवारी पांडेय के सानिध्य में शुरू की गई। इस कंपनी में प्रयुक्त होने वाले रंग का केमिकल बंबई से मंगाया जाता रहा, इसलिए इसका नाम बंबई कलर एजेंसी रखा गया। इसकी खपत देश के कई छोटे-बड़े शहरों में हुआ करती थी। कुटीर उद्योग के रूप में पनपने वाले इस उद्योग को विभिन्न बस्तियों में प्रोत्साहन मिलने के साथ ही घर बैठे महिलाओं एवं पुरुषों को काम मिलने लगा। सैदपुर के दमगढ़ान, मलहिया टोला, पश्चिम बाजार आदि कई स्थानों पर रंग उद्योग पनपने लगा। कपड़े रंगने, बेल-बूटे बनाने और कपड़ों की छपाई करने का काम कस्बों में होता था। सैदपुर के बसंती, गुलाबी, लाल, हरे और बैगनी रंगों के साथ पुडिय़ा वाले नील की स्त्रत्त्मांग से औडिहार जंक्शन और सैदपुर रेलवे स्टेशन का माल गोदाम साल के बारहों माह रंग के बड़े-बड़े कार्टनों एवं पैक गांठों से भरा रहता था। रंग के कारखानों में काम करने वाले मजदूरों का हुजूम जब दोपहर को मध्यावकाश में भोजन से पहले गंगा स्नान के लिए जाता तो विभिन्न घाटों से गंगा का पानी कई किलोमीटर तक रंगीन हो जाया करता था। समय के बदलते परिवेश में इन रंगों की चमक फीकी पड़ने लगी और इसकी जगह सिंथेटिक रंगों ने ले ली। रंगों के पर्व के करीब आने पर यहां का रंग उद्योग एक बार पुन: अपनी छटा बिखेरने लगता है। रंग उद्यमी अंबिका कमलापुरी, हरिशंकर गुप्ता, सुदर्शन, अजय पांडेय, कृष्णचंद पांडेय, रतन लाल आदि ने बताया कि कुटीर उद्योग होने के बावजूद सरकार द्वारा कोई सुविधा अथवा प्रोत्साहन नहीं है। श्रमिकों का बड़े शहरों का पलायन होना इसके साथ ही संसाधनों का अभाव भी इस उद्योग में गिरावट का कारण है।