अवस्थापना और 14वें वित्त आयोग के फंड से विकास कार्यों की मंजूरी के लिए अब मंडलायुक्त की सहमति का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। मेयर और नगर आयुक्त इन फंड के विकास कार्यों को मंजूरी दे सकेंगे।
सरकार ने मंडलायुक्त से यह अधिकार वापस लेकर फिर निगम में निहित कर दिया है। नगर आयुक्त और मेयर को इससे पहले वर्ष 2010 में भी यह अधिकार दिए गए थे, लेकिन 2012 में सपा सरकार ने इसे निरस्त कर मंडलायुक्त को अधिकृत कर दिया था।
अब नगर विकास विभाग ने हाल ही में आदेश जारी कर 2012 के आदेश को निरस्त कर फिर से मेयर और नगर आयुक्त को अवस्थापना व वित्त आयोग के फंड से कार्य स्वीकृत, टेंडर स्वीकृति और बिलों के भुगतान का अधिकार दे दिया है।
नगर विकास विभाग के सचिव श्रीप्रकाश सिंह ने आदेश में कहा है कि 13वें व 14वें वित्त आयोग के फंड से संबंधित कार्य मंडलायुक्त स्तर से गठित कमेटी की बैठक समय से न होने के कारण विकास कार्यों में देरी हो रही है। इससे नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों को स्वायत्ता का अधिकार नहीं मिल रहा है।
वहीं जनता भी इससे प्रभावित होती है। उन्होंने शासनादेश में कहा है कि 2012 में मंडलायुक्त को दी गई जिम्मेदारी के आदेश को समाप्त कर 2010 में जारी किए गए आदेश को फिर से प्रभावी कर अवस्थापना, वित्त आयोग के फंड से कार्यों की स्वीकृति, निविदा स्वीकृति और बिलों के भुगतान की स्वीकृति का अधिकार निकायों को दिया जा रहा है।
अब मंडलायुक्त से अनुमोदन कराने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि इन फंड से होने वाले कार्यों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए मंडलायुक्त कार्रवाई कर सकेंगे।
अधिकारी नहीं कर सकेंगे मनमानी
नए शासनादेश के लागू होने से अब निगम अधिकारी मनमानी नहीं कर सकेंगे। महापौर का हस्तक्षेप बढ़ जाने की वजह से अब शहर की प्राथमिकताओं के मुताबिक काम हो सकेगा। पार्षद भी मेयर के जरिए जरूरी कार्यों को करा सकेंगे। इससे पहले निगम अधिकारियों पर खुद ही विकास कार्यों के प्रस्ताव तैयार करने का आरोप लगता रहता था।