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अवैध कटान से महुवा के पेड़ों पर संकट

Fri, 08 Apr 2016 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फूला खड़ा महुवा का दरख्त। - फोटो : amarujala
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घाटमपुर के  गांवों के किनारे खेत-खलिहानों के साथ ही जंगलों में बहुतायत से दिखाई पड़ने वाले महुवा के पेड़ अब मीलों जाने के बाद भी नहीं दिखाई देते हैं। जंगलों के सफाए और वन माफियाओं की गिद्ध दृष्टि से इस बहुउपयोगी वृक्ष के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
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होली जलते ही महुवा के दरख्तों में पतझड़ शुरू हो जाता है। चैत्र के  महीने में उनमें फूल (महुवा) खिलकर गिरने शुरू जाते हैं। फूलों का उपयोग दवा के साथ ही खाने के प्रयोग में भी होता है। जबकि, फूल को सड़ाकर बनाई जाने वाली देशी दारू को कई मर्जों के इलाज में रामबाण माना जाता है। दारू की मालिश से छोटे बच्चों को सर्दी लगने और निमोनिया होने पर काफी फायदा मिलता है।

इसके फल मई-जून के महीनों में पकते हैं। वात और गठिया के रोगियों के लिए महुवा के फल (गुल्लू) का तेल मालिश करने से काफी आराम मिलता है। इसकी लकड़ी बेहद मजबूत और टिकाऊ होने के चलते इमारती सामान बनाने और ईंधन (दोनों) के काम आती है।
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आयुर्वेद के जानकारों डा. रामसनेही तिवारी (नंदना), मनोज प्रजापति (हमिरामऊ), उदयनरायण सचान (कुंवरपुर) और बेनीमाधौ सविता (रंजीतपुर) ने बताया कि महुवा की जड़ से लेकर छाल, पत्ता, फूल और फल सभी उपयोगी हैं। चैत्र का महीना शुरू होते ही महुवा के फूलों की भीनी-भीनी सुगंध दूर-दूर तक फैलती है। लेकिन, बीते दो दशक के दौरान हुई और छायादार पेड़ों की अंधाधुंध कटान में इनके दरख्त खत्म से हो गए हैं। जंगलों की बात तो दूर अब गांवों के
किनारे खेत-खलिहानों तक में दूर-दूर तक महुवा के एक-दो पेड़ भी दिखाई पड़ना दुर्लभ सा हो गया है।

वन क्षेत्राधिकारी अतुलकांत शुक्ला ने बताया कि महुवा प्रतिबंधित प्रजाति का पेड़ है। इसके काटने पर प्रतिबंध है। इधर, उद्यान निरीक्षक राकेश कुमार गोस्वामी ने बताया कि महुवा का पेड़ पथरीली और बंजर भूमि पर भी तैयार हो सकता है। बताया कि अन्य पौधों की अपेक्षा महुवे का पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है।
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