सावन-भादों के महीनों में पर्याप्त बरसात न होने और जनवरी-फरवरी के महीनों में भी मौसम सूखा निकल जाने से जहां दलहनी फसलें चना, मटर और मसूर बर्बाद हो गईं। वहीं अब अरहर की फसल में भी कीटों का प्रकोप होने से किसानों के सामने समस्या खड़ी हो गई है। एकमात्र बची दलहनी फसल अरहर का उत्पादन भी प्रभावित होने की आशंका है।
चने के बाद अरहर की फसल को दलहन की अच्छी उपज देने वाली गिना जाता है। लेकिन, इस वर्ष औसत की एक तिहाई बरसात होने से चना और मटर की 60 फीसदी और मसूर की 50 फीसदी फसल नष्ट हो चुकी है। तहसील क्षेत्र के यमुना तटवर्ती क्षेत्र के गांवों सिधौल, रामपुर, बगरिया, सिरसा, मैधरी, बरीपाल, समुही, बीरबल का अकबरपुर, मऊनखत, बीबीपुर, दहिलर, महुवापुरवा, हरदौली, कटरा-काटर, मकरंदपुर, कोटरा, दौलतपुर, गड़ाथा, तहरापुर, कोरों, अमिरतेपुर, दुबाई और गढ़ोलामऊ समेत अन्य गांवों के
किसानों ने बताया कि उनके यहां बड़े पैमाने पर मसूर और चने की फसल बोई जाती है। लेकिन, लगातार तीसरे वर्ष भी अधिकांश फसल चौपट हो जाने से वह तबाह हो गए हैं।
इधर, इन इलाकों में अरहर की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। किसानों ने बताया कि दिसंबर से लेकर फरवरी तक कड़ाके की ठंड न पड़ने से इस बार अरहर की फसल पाले से तो बच गई है। लेकिन, जाड़े के मौसम में होने बरसात (महावट) न होने से आधी फसल तो खेतों में ही सूख गई। जबकि, जो पौधे बचे उनमें फलियां तो खूब लगीं हैं और उनमें दाने भी मजबूत होने लगे हैं।
इधर, मार्च के दूसरे पखवारे में मौसम अचानक बदल गया है। गर्मी का प्रकोप शुरू होने के साथ ही बीते कई दिनों से पुरवइया हवा भी चल रही है। मार्च के महीनें में तीन बार हल्की-फुल्की बारिश हो जाने से अरहर के पौधों में लगी फलियों में कीटों का प्रकोप शुरू हो गया है। मुख्य रूप से आरा मक्खी और फलीछेदक कीट (गिडार) का प्रकोप है, जिससे फसल को भारी नुकसान होना तय है।
लगातार तीसरे वर्ष भी अरहर की फसल पर रोग और कीटों के प्रकोप से उपज प्रभावित होना तय है। जिसके चलते इसबार भी अरहर की दाल आम आदमी की पहुंच से बाहर ही रहने की आशंका है। मालूम हो कि पिछले महीनों 250 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बिकी अरहर की दाल को लेकर पूरे देश में हाहाकर मच गया था। जानकारों का मानना है कि इस वर्ष भी फसल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जिससे अरहर के दालों के भाव आसमान पर ही रहेंगे।
दलहनी फसल अरहर को कीटों के प्रकोप से बचाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि रक्षा इकाई में उपलब्ध दवाओं (कीटनाशकों) का घोल बनाकर पौधों में छिड़काव करने की सलाह दी है। शस्य वैज्ञानिक श्रीकृष्ण यादव ने बताया कि पौधों में इंडो सल्फान और मोनो क्रोटाफास जैसे कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल में दो बार (प्रति हेक्टेेयर) की दर से छिड़काव करें।