फिरोजाबाद। ये दो केस तो महज बानगी हैं। ऐसे जिले में दर्जनों अस्पताल हैं तो फर्जीवाड़े के दम पर चलते आ रहे थे। जिनमें डॉक्टर अस्पताल में हैं ही नहीं और उनके नाम पर रजिस्ट्रेशन है। ये डॉक्टर किसी और शहर में प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं और अपने नाम से रजिस्ट्रेशन के एवज में हर माह लाखों रुपये अवैध अस्पताल संचालकों से लेते हैं।
मरीजों को धोखा देकर मोटी कमाई की जा रही है। इस साल शासन ने सख्ती की तो दो से तीन जगह रजिस्ट्रेशन कराने वाले चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। यही कारण है कि जिले में पंजीकृत अस्पतालों की संख्या आधी रह गई है। जून माह बीतने के बाद बीते साल से पचास फीसदी अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन नहीं हो सके हैं।बीते साल अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी की संख्या 250 थी। इस बार सख्ती बरती गई तो अभी तक बमुश्किल 120 अस्पतालों का पंजीकरण हो सका है। करीब 130 अस्पताल, क्लीनिक पंजीकरण से वंचित हैं। इस बार वह चिकित्सक हाथ खड़े कर गए हैं। ऐसे में अस्पताल और क्लीनिकों के पंजीकरण कम हो पा रहे हैं।
केस नंबर एक
पांच साल से लखनऊ के डॉक्टर के नाम से था रजिस्ट्रेशन
बंबा रोड स्थित एक अस्पताल का रजिस्ट्रेशन बीते पांच साल से लखनऊ के एक डॉक्टर की डिग्री पर था। बोर्ड पर भी डॉक्टर का नाम लिखा था। मगर, डॉक्टर साहब कभी इलाज करने नहीं आए। इस बार सख्ती बढ़ी और एक चिकित्सक को एक ही अस्पताल में रजिस्ट्रेशन का नियम बनाया तो वह अस्पताल रजिस्ट्रेशन से वंचित रह गया।
- केस नंबर दो
- मक्खनपुर के निकट स्थित एक अस्पताल में आगरा के चिकित्सक के नाम से बीते तीन साल से रजिस्ट्रेशन कराया जा रहा है। अफसर भी बिना सत्यापन किए कागजों पर हर साल रजिस्ट्रेशन कर रहे थे। इस बार उस अस्पताल का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। एक से ज्यादा स्थान पर चिकित्सक का रजिस्ट्रेशन होने से साफ्टवेयर तुरंत पकड़ लेगा।
- एक चिकित्सक का एक ही जगह रजिस्ट्रेशन होगा। इसलिए अस्पतालों के पंजीकरण की संख्या घटी है। हमारी कार्रवाई अवैध अस्पताल, क्लीनिक, पैथोलॉजी के खिलाफ शुरु हो गई है। जिनका पंजीयन नहीं होगा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - डाॅ. नरेंद्र कुमार, सीएमओ फिरोजाबाद
कमीशन के खेल में फेल है सिस्टम
इस खेल के एक अहम किरदार एंबुलेंस चालक हैं। अस्पताल में इलाज के लिए लाने पर मुन्ना भाई ने उनका कमीशन तय कर दिया है। एंबुलेंस चालक को मरीज के हिसाब से रुपये मिलते हैं। गंभीर सर्जरी वाले मरीजों का रेट सर्वाधिक है। ऐसे मरीज लाने पर एंबुलेंस चालकों को 10 से 15 हजार, छोटी सर्जरी वाले मरीजों के लिए आठ से 10 हजार और सामान्य मरीजों को लाने पर तीन से पांच हजार रुपये तय हैं। इसके लिए एंबुलेंस चालक जिले के विभिन्न कस्बों व ग्रामीण इलाकों के मरीजों को फांसते हैं। अच्छे इलाज का झांसा और मेडिकल कॉलेज में अधिक भीड़ दिखाकर मरीजों को निजी अस्पतालों में पहुंचा देते हैं।
शपथ पत्र देने का है नियम
अस्पताल के पंजीकरण के दौरान जिस डॉक्टर का नाम रहता है, वह शपथ पत्र देता है। शपथ पत्र में इस बात का जिक्र रहता है कि वह अस्पताल में बैठेगा और मरीजों का इलाज करेगा। इसके अलावा इमरजेंसी में किसी भी समय इलाज के लिए उपलब्ध रहेगा। लेकिन शपथ पत्र देने के बाद भी बड़ी संख्या में डॉक्टर अपने नाम से पंजीकृत अस्पतालों में नहीं बैठ रहे हैं।