ठिठुरती भोर में बेबस मजदूरों का बैंक बने ठिकाना
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करेंसी के संकट ने लोगों की रात की नींद और दिन चैन छीन लिया है। सुबह से रात तक सिर्फ करेंसी के संकट का चिंता है। सुहाग नगरी श्रमिक बहुल क्षेत्र है। लाखों श्रमिक यहां काम करते हैं। रोज की मजदूरी पर इनका जीवन-यापन चलता है। जिले भर से मजदूर शहर में काम करने तड़के आते हैं और रात को जाते हैं। पैसा के संकट ने इन मजदूरों के सामने खान-पान का संकट भी खड़ा कर दिया है। कई कारखाने बंद हैं। तमाम कारखानों में मालिकों ने हजार और पांच सौ के नोटों को ठिकाने लगाने के लिए ठेके पर काम करने वाले ठेकेदारों को एडवांस पैसा दे दिया है। ठेकेदार ने भी मजदूरों को हजार-पांच सौ का नोट थमा दिया। इस करेंसी को लेकर मजदूर रसोई का सामान लेने जाते हैं तो दुकानदार सामान देने से मना कर देते हैं। हाथ में पैसा है लेकिन बाजार में नहीं चल रहा है और मजदूरों के घरों में रोटी का संकट खड़ा हो गया है। अमर उजाला की टीम तड़के चार बजे शहर में निकली तो चौंकाने वाले हालात सामने दिखाई दिए। सर्दी में लोग तड़के तीन बजे ही बैंक के बाहर डेरा जमा कर बैठ गए थे। बैंक के गेट पर नंबर लगा दिया था। बैंक तो सुबह दस बजे से खुलनी थी लेकिन नंबर पर लोग तड़के तीन बजे से आकर बैठ गए थे। यानी बैंक द्वार खुलने के लिए आठ घंटे का इंतजार उसके बाद करेंसी बदलने का इंतजार।