फर्रुखाबाद/कमालगंज। पूरे देश में आलू बेल्ट के रूप में विख्यात फर्रुखाबाद के तरबूज की मिठास दिल्ली, राजस्थान और पूर्वांचल के साथ ही बिहार तक स्वाद को लाजवाब बना रही है। बिहार के गया, आरा व नबादा जिले में यहां का चमकदार लाल तरबूज काफी पसंद किया जा रहा है। रोजाना करीब 50 ट्रक व डीसीएम की लदान हो रही है।
गंगा की रेती में सैकड़ों किसानों ने तरबूज की खेती की है। करीब 25 दिन से तरबूज की तुड़ाई चल रही है। बहुत से किसान सीधे अपना माल डीसीएम से लदान कराकर बाहर की मंडियों में ले जा रहे हैं। कई किसान व्यापारियों के हाथ यहीं सौदा कर रहे हैं। दिल्ली व राजस्थान के साथ ही पूर्वांचल के बस्ती, बाराबंकी, मऊ, देवरिया, लखनऊ व बिहार के कुछ शहरों में तरबूज जा रहा है। गहरे काले रंग के छिलके वाले आइसबॉक्स एफ-1 किस्म का तरबूज इस बार अधिक पसंद किया गया। धारीदार नामधारी की भी बिक्री है। भोजपुर के किसान सुनील पाल ने बताया कि पहली टूट का माल वह 5 अप्रैल को दिल्ली मंडी ले गए थे। वह 15 रुपये किलो बिका। दो रुपये का खर्चा निकालने पर 13 रुपये के दाम आए। 7 से 8 रुपये किलो की लागत आने से फायदा भी हुआ। पर आगे की गाड़ियों में भाव कम होने पर फायदा कम रह गया।
आजाद नगर के किसान नन्हें का कहना है कि पानी बरसने व अंधी से पैदावार कम निकल रही। दूसरे व तीसरे दिन पानी लगाने से लागत बढ़ जाती है। गत वर्ष 7 से 10 रुपये रेती का तरबूज बिका। वहीं इस बार 8 रुपये से 15 रुपये भाव रहा।
आलू, तरबूज व्यापारी व किसान शांतिबोध पालीवाल कहते हैं कि रेती पर तरबूज की खेती में प्रति एकड़ करीब 1 लाख रुपये या इससे अधिक भी लागत आती है। जबकि पहाड़े की जमीन पर लागत 30 से 35 हजार ही खर्च होता है। इस बार पहाड़े पर तरबूज उत्पादक किसानों को अच्छा लाभ मिल सकेगा। पहाड़े की जमीन पर तरबूज तैयार है। बिहार को जो भी माल भेजा गया, वह खूब पसंद किया गया। रमजान समाप्त होने पर भाव कम हो सकता है।
-