फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फर्रुखाबाद घराना व ललन पिया की स्वर्णिम 'आभा' से 'दमका' भारतीय संगीत

विज्ञापन
विज्ञापन
(अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस 21 जून को विशेष) डॉ. राजेश औदीच्य फर्रुखाबाद। संगीत के क्षेत्र में भी फर्रुखाबाद की माटी ने पूरे देश में सुर, लय व ताल की त्रिवेणी से साधकों को मोहित किया है। देश के छह प्रसिद्ध तबला घरानों में फर्रुखाबाद घराने की मिठास के लोग कायल हुए। यहां जन्मे तबला वादक उस्ताद हाजी विलायत अली ने तबला वादन में 'स्याही' के बोलों की अधिकता वाली ऐसी विशिष्ट शैली दी कि यहां के बोल अन्य बाजों से अधिक मीठे और कोमल बन गए। वहीं बंदिश की ठुमरी के सम्राट ललन पिया ने अपनी ठुमरी में शब्दों के मोती पिरोए तो संगीत के क्षेत्र में ठुमरी में नई बोल-बांट शैली अस्तित्व में आ गई। इस शैली में देश के अनेक संगीतकार उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने में लगे हैं। फर्रुखाबाद के चीनीग्राम मोहल्ले में 1779 में जन्मे हाजी विलायत अली ने अल्लाह से दुआ की थी कि वह कुछ ऐसा कर सकें जो जन्मभूमि का नाम रोशन हो। शुरू से ही भारतीय संगीत में रमें उनके मन में उभरीं गतें व बोल जब तबले के नाद सौंदर्य में झंकृत हुईं तो वहीं से शुरू हो गया तबले का फर्रुखाबाद बाज घराना। तबला वादन के छह घरानों दिल्ली, पंजाब, अजराड़ा, बनारस, लखनऊ व फर्रुखाबाद में फर्रुखाबादी बाज की खास शैली रही है। उस्ताद हाजी विलायत अली ने संगीत की दुनियां में नई प्रकार की कई गतों का अविष्कार किया। इन गतों की अपनी खास चाल है। एक गत में ही कई बार चाल बदलती है। 'तुम किन किन धन दिन्ता, धन नन नन कत तुम किन कत', 'दिन गिनत गिनत नन तकत तकत तन कत्त कत्त' जैसे अर्थपूर्ण शब्दों से वादन भावपूर्ण बन गया। कोलकाता में उस्ताद करामत उल्ला व पंडित ज्ञानघोष आदि ने भी इस घराने के नामचीन तबला वादक के रूप में प्रसिद्धि पाई। ललन पिया उप नाम से मशहूर पंडित नंदलाल सारस्वत शहर के मित्तू कूंचा मोहल्ले के थे। उनका जन्म 1856 में हुआ था। उनकी अधरबंद ठुमरी में 'सखि सैंया की सुरतिया जियरा हरे, ऐसे नैना अनियारे कजरारे खंजन सो खरे' व 'काहे बनाओ झूठी बतियां हमसे, बतियां न बनाओ मोसे फेर-फेर' जैसी रचनाएं संगीत के क्षेत्र में मानों सर्वकालिक बन गईं हैं। ललन पिया ने करीब एक हजार ठुमरियों की रचना की। उन्होंने बंदिश की ठुमरी में बोल बांट शैली को जन्म दिया। यह घनाक्षरी बंदिशें कही जातीं हैं। ललन पिया हाजी विलायत अली संगीत समित के सचिव डॉ. विद्या प्रकाश दीक्षित का कहना है कि सितार व कथक में भी फर्रुखाबादी छाप रही है। उस्ताद प्यारे खां व उस्ताद बरकत अली ने सितार वादन व पंडित बाबूराम गौड़ नवाब वाजिद अली शाह के दरवार में बिंदादीन महाराज से कथक सीखकर आए थे। डॉ. ओमप्रकाश मिश्र कंचन की संगीत साधना भी पांचाल क्षेत्र के लिए अविस्मरणीय बनी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें