फर्रुखाबाद। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 50 लाख गबन के आरोपी तत्कालीन डीआईओएस, लेखाधिकारी, पर्यवेक्षक, 18 सहायक अध्यापक, छह चतुर्थश्रेणी कर्मचारियों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है। यह मुकदमा वर्ष 1999 से चल रहा है। इसमें उच्च न्यायालय से स्टे था, जो दिसंबर 2021 में खारिज हो गया था। इसके बावजूद आरोपी कोर्ट में हाजिर नहीं हुए।
शहर के मोहल्ला दिलावरजंग निवासी टैगोर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य ओम नारायण सिंह की अर्जी पर तत्कालीन डीआईओएस रामनरेश, लेखाधिकारी नीरज श्रीवास्तव, पर्यवेक्षक वीरेंद्र कुमार दीक्षित, रामानंद इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य वीरेंद्र देव चतुर्वेदी, भारतीय इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य आनंद मोहन चतुर्वेदी, इसी विद्यालय के सहायक अध्यापक हर्षदेव, रामपाल सिंह, नरेंद्र सिंह, राजीव कुमार, सोवरन सिंह, सफाई कर्मी राकेश कुमार, अर्दली रामकिशोर, रामानंद इंटर कॉलेज के सहायक अध्यापक रामवीर सिंह, सुरेंद्र सिंह, संतोष कुमार, कृपाल सिंह, रामप्रकाश, रामनिवास, हरवेंद्र सिंह, हरी सिंह, भूरेलाल, विश्वनाथ, भारत सिंह, शिवरत्न सिंह, श्रीपाल सिंह, चतुर्थश्रेणी कर्मचारी अरविंद, देशराज, राजवीर, सिपाही राम के खिलाफ 12 मार्च 1999 को धोखाधड़ी व गबन का मुकदमा शहर कोतवाली में दर्ज हुआ था।
आरोप है कि टैगोर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय को हाईस्कूल की मान्यता जुलाई 1983 में मिली थी। शिक्षण संस्थान का पंजीकरण डिप्टी रजिस्ट्रार सोसाइटी फमर्स एवं चिट्स कानपुर में हुआ था। 27 मार्च 1997 से प्रदेश सरकार ने विद्यालय को अनुदान देना शुरू किया। पहली बार 5.20 लाख रुपये अनुदान आया। वेतन भुगतान के लिए विद्यालय के नाम से खाते ग्रामीण बैंक शाखा कोठा पार्चा में खोले गए।
डीआईओएस, लेखाधिकारी व पर्यवेक्षक ने सरकारी धन हड़पने की योजना बनाई। इसमें विद्यालय के शिक्षक और कर्मचारियों को शामिल किया। विद्यालय के शिक्षक व कर्मचारियों को दो भागों में बांटकर 14 जुलाई 1997 को रामानंद इंटर कॉलेज और 28 अप्रैल 1998 को भारतीय इंटर कॉलेज से संबद्ध कर दिया।
जबकि डीआईओएस को दूसरे विद्यालय से संबद्ध करने का अधिकार नहीं था। ड्यूटी किए बिना शिक्षक और कर्मचारियों को वेतन भुगतान किया गया। वेतन बिलों पर उनके हस्ताक्षर भी नहीं कराए गए। 17 मई 1998 को संस्था बंद हो गई।
इसकी जानकारी के बावजूद डीआईओएस शिक्षक व कर्मचारियों को वेतन भुगतान करते रहे। 14 दिसंबर 1998 को कोषाधिकारी से शिकायत हुई। इसके बाद डीएम ने भुगतान पर रोक लगा दी। शिक्षक व कर्मचारियों के संबद्धीकरण के विरोध में उच्च न्यायालय में रिट दायर की गई। अभिलेख मांगे जाने पर डीआईओएस ने संबद्धीकरण निरस्त कर दिया।
आरोपियों ने जालसाजी कर करीब 50 लाख रुपये का सरकारी धन आपस में बांट लिया। पुलिस ने नौ सितंबर 2000 को एफआर लगा दी। कोर्ट ने एफआर खारिज कर सभी आरोपियों को तलब किया था। इस आदेश के खिलाफ आरोपी सिपाहीराम ने उच्च न्यायालय में अपील की थी, जो दिसंबर 2021 में खारिज हो गई थी।