संक्रामक बीमारियों की चपेट में आने से गुरुवार को तारुन के दो मासूम बच्चों की मौत से हड़कंप मच गया। हरकत में आई सरकारी मशीनरी ने फौरन संक्रामक रोगों से ग्रसित गांवों में स्वास्थ्य विभाग की टीम भेज खसरे से बीमार बच्चों को दवा खिलवाई।
ग्रामीण इस बात को लेकर आक्रोशित हैं कि मौत के बाद यह टीम गांव पहुंची, यही काम पहले हुआ होता तो शायद बच्चों की मौत न होती। हैदरगंज के ग्राम पंचायत सराय मनोधर के मजरे गनेशपुर में प्रधान रामानंद पांडेय, सतीश दुबे, बब्बन पांडेय, सुशील दुबे, सुनीता, रामावती आदि संक्रामक बीमारियों से ग्रसित हैं।
गनेशपुर गांव के 50 घरों के पुरवे में पांच घरों को छोड़ कर सभी घरों में लोग खसरे से पीड़ित हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गांव में मार्च से खसरे का प्रकोप है। कई बार इसकी सूचना दी गई लेकिन स्वास्थ्य विभाग के काने पर जूं तक नहीं रेंगी। गुरुवार सुबह संक्रामक रोग से ग्रसित राजित राम की पांच वर्षीय पुत्री राधा की मौत हो गई।
कुछ ही समय के अंतराल पर मिश्रहिया निवासी शैलेंद्र प्रताप यादव के चार वर्षीय पुत्र प्रभाकर यादव की भी मौत हो गई। उसे उल्टी-दस्त हो रही थी। प्रभाकर का इलाज सीएचसी तारुन में चल रहा था। जहां से उसे बुधवार रात जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया था। रास्ते में ही उसकी सांसें थम गईं।
डॉ. वेदप्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि बच्चे की मौत निमोनिया के कारण हुई है। मौतों की सूचना मिलते ही सरकारी मशीनरी में हलचल मच गई। स्वास्थ्य विभाग के संक्रामक रोग नियंत्रण अधिकारी डॉ. अरविंद, डॉ. वेदप्रकाश तिवारी, डॉ. दिनेश कुमार सिंह दर्जन भर स्वास्थ्य कर्मियों के साथ गांव पहुंचे।
जहां खसरा जैसे संक्रामक रोग से ग्रसित 18 रोगियों को दवा खिलवाई गई। गांव की मुस्कान, अंकित, सूरज, साक्षी, सुनैना, राजेंद्र, नेहा, प्रज्ञा, खुशी, गरिमा सहित अन्य खसरे की चपेट में हैं। पीड़ित बच्चों की माताएं सुनीता, शोभावती, निर्मला, मालती, मीरा आदि ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग के लोग सूचना के बाद पहले कभी नहीं दिखाई दिए।
कुछ लोगों को दवा दी गई थी जिससे बीमारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। यही कारण है कि लोगों का सरकारी अस्पताल से भरोसा उठ गया और पीड़ित निजी चिकित्सकों से इलाज करा रहे हैं। संक्रामक रोगों की चपेट में बसंती का पुरवा, जाना, खजुरीपुर, पछियाना, धमहर सहित कई गांव हैं।