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नगरपालिका के मंदिर का पुजारी बन बैठा मालिक

Thu, 09 Jul 2015 10:48 PM IST
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
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1965 से 2004 तक मालिक बनाने और बदलने के इस खेल में कर्मियों का भरपूर साथ उस समय रहे ईओ ने भी दिया है। वर्तमान में इस मंदिर का मालिक तीन पीढ़ियों को बनाया गया है।
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नियमत: किसी संपत्ति के मालिक एक साथ पौत्र, पिता और बाबा नहीं बन सकते। कर्मियों ने नियम दरकिनार कर कागजों में बलराज तिवारी, हरिनारायण तिवारी और जनार्दन तिवारी को मालिक बनाया है।

खुलासा मंदिर की नई कमेटी बनाये जाने पर हुआ। पालिका चेयरमैन विजय कुमार गुप्त के सामने गुरुवार को इलाकाई लोगों के साथ ही केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति के सह संयोजक गगन जायसवाल, राजेंद्र राजू, सरदार राजेश, अनिल अग्रवाल, अरविंद गुप्त, अशोक गुप्त, शिवम जायस, राजू पहलवान आदि ने पुजारी पर सार्वजनिक मंदिर और उसकी जमीन को हड़पने का आरोप लगाया।
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सच्चाई जानने के लिए चेयरमैन ने पुराने दस्तावेजों को निकलवाया तो कूटरचना का खुलासा हुआ। लोगों का कहना था कि पुजारी ने हिंदुओं द्वारा विवाह के दौरान कुआं पूजे जाने पर रोक लगा दी है।

 मंदिर के लाउडस्पीकर से भजन बजाने और सामूहिक भंडारे पर पाबंदी है। आरोप था कि एतराज करने वालों से पुजारी झगड़े पर आमादा होते हैं। इनका कहना था कि 1936 से नजूल भूमि और मंदिर पर पालिका का मालिकाना हक है।

आज भी चेयरमैन को इसका मालिक होना चाहिए, लेकिन पालिका कर्मियों ने कूट रचना करके फर्जी कार्य करके जनार्दन तिवारी को मंदिर का मालिका बना दिया है। इसे खारिज कर पालिका के कब्जे में किया जाये। चेयरमैन विजयकुमार गुप्त ने सभी से ईओ के लौटने पर बात करने के साथ ही विधिक कार्रवाई का भरोसा दिया।

नगर पालिका के चेयरमैन विजय कुमार गुप्त ने कहा कि पालिका की करोड़ों की जमीन और मंदिर को पुजारी के नाम कर देने के खेल में यहां के कर्मी और अधिकारी शामिल हैं।

किसी संपत्ति की मालिक तीन पीढ़ी एक साथ नहीं हो सकती। ईओ रविशंकर शुक्ल 16 जुलाई तक अवकाश पर हैं। उनके आने के बाद मसले पर चर्चा होगी, विधिक राय ली जा रही है।

जांच कमेटी बनेगी। इसमें जो भी कर्मी-अधिकारी दोषी मिलेगा, कठोर कार्रवाई होगी। वहीं केंद्रीय दुर्गापूजा समिति के सह संयोजक गगन जायसवाल ने बताया कि मंदिर की पुरानी कमेटी में एक मात्र जीवित सदस्य सुंदर लाल अग्रवाल ही बचे हैं। मंदिर की नई कमेटी बनाकर रजिस्ट्रेशन कराने को कहा था।

कमेटी बनी व लोग रजिस्ट्रेशन को पहुंचे तो कार्यालय से यह कहकर वापस कर दिया गया कि निजी संपत्ति का रजिस्ट्रेशन नहीं होता। कूट रचना के सहारे कर्मियों ने अभिलेखों में पालिका के बजाय पुजारी को मालिक बना दिया है।
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