जिले की थोक मंडी से दालों का संकट बता दाम बढ़ाने का सिलसिला जारी है। इस पर सरकारी अंकुश नहीं लग पाया है। हालांकि थोक व फुटकर व्यापारी के यहां स्टॉक की कमी नहीं है। महंगाई से गरीब और मध्यम वर्ग की थाली से दाल गायब हो चुकी है। जमाखोरी के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर प्रशासन ने कोई रणनीति तक नहीं बनाई है। डीएसओ भी महंगी दाल बेचते व्यापारियों से कदमताल मिलाते हुए क्राइसिस का दावा कर रहे हैं।
इंडस्ट्रियल एरिया में तीन दाल मिलें हैं, लेकिन यहां मटर की दाल दली जाती है। यहां के थोक व्यापारी एमपी से इलाहाबाद आनी वाली अरहर दाल खरीदते हैं। व्यापारियों का कहना है कि एमपी से ही लखनऊ व कानपुर की मंडी में भी दालें आती हैं। जबकि वहां संकट बताया जा रहा है। व्यापारी भी ज्यादा दाल नहीं मंगा रहे हैं कि कहीं दाम कम हुए तो नुकसान बड़ा होगा। दाल की सबसे बड़ी मंडी फतेहगंज बाजार है।
हाल यह है कि बड़े दुकानदारों के यहां दालों का कोई अभाव नहीं है। उनके गोदाम भरे बताए जा रहे हैं लेकिन इनके मालिक फुटकर दुकानदारों को दालों की कमी बताकर महंगे में माल बेच रहे हैं। उधर छोटी व बड़ी सभी दुकानों पर दाल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। हर कोई यह दाल आसानी से, किंतु ऊंचे दामों पर सभी दुकानों से पा सकता है। ऐसे में 160 से 200 रुपये किलो में अरहर की दाल मिलने से गरीब व मध्यम वर्ग की थाली से दाल गायब है।