बीकापुर में पूर्वजों के गांव में पहुंचे रामकृष्ण का स्वागत करतीं महिला।
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बीकापुर तहसील प्रशासन की मदद से कई दिनों से अपने पूर्वजों के पैतृक गांव की खोज में जुटे सात समंदर पास दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर निवासी रामकृष्ण रामनाथ को आखिरकार अपनी पुश्तैनी जड़ें मिल गईं। 28 अप्रैल 1861 को उनके परदादा भिखारू गिरमिटिया मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका गए थे, तहसील प्रशासन की जांच में दस्तावेजों से मिलान और बुजुर्गों से जानकारी के बाद मंगलवार को करौदी गांव से भिखारु के जाने की पुष्टि हुई। यहां पहुंचे एनआरआई रामकृष्ण को लोगों ने माला पहना कर स्वागत किया तो गांव की महिलाओं ने आरती उतारी।
रामकृष्ण को पूर्वजों के पैतृक निवास की सोंधी मिट्टी सात समंदर पार से यहां तक खींच लाई। 60 वर्षीय रामकृष्ण वहां एक निजी कंपनी में जुड़े हैं। जब जानकारी हुई कि उनके परदादा भारत के रहने वाले थे तो, उनके मन में जिज्ञासा जागी कि अपने पूर्वजों का पैतृक गांव देखा जाए। इसके लिए छह माह का वीजा लेकर भारत आए। फैजाबाद के एक होटल में ठहरने के बाद जिलाधिकारी से मिले।
जिलाधिकारी के निर्देश पर बीकापुर तहसील प्रशासन द्वारा 2 दिनों से रामकृष्ण के साथ उनके पैतृक गांव की खोज की जा रही थी। मंगलवार सुबह हैदरगंज थाना क्षेत्र के करौंदी गांव पहुंचने पर बुजुर्गों द्वारा रामकृष्ण द्वारा दिए गए प्रमाण पर सहमति जताई गई, फिर उनका बिछड़ा परिवार मिल गया। गांव पहुंचते ही ग्रामवासियों ने फूल माला तो महिलाओं ने थाल में आरती सजा कर उनका स्वागत किया।
पैतृक गांव पाकर निहाल हुए एनआरआई रामकृष्ण ने बताया कि लगभग सौ सदस्यों का परिवार हमारा अफ्रीका में है और यहां पुन: आएंगे और परिवार के अन्य सदस्यों को भी यहां लाकर गांव का दर्शन करवाएंगे।