एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।
अयोध्या। तुलसीदास जी के अनुसार, श्रीरघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें एक छत्ररूप से और दूसरा मुकुटमणि रूप से सभी अक्षरों से ऊपर है। इसका असर रामनगरी में भी देखने को मिलता है। रामनगरी की संस्कृति व संस्कारों में राम के साथ उनके नाम में भी अनुराग समाहित है। इसकी पुष्टि अयोध्या में स्थित नामोपासना के कई प्राचीन केंद्रों से भी होती है। जहां कई पीढ़ियों व कई दशकों से अखंड रामनाम की धुन गूंज रही है।
ऐसा ही एक प्रमुख केंद्र रामनगरी के सरयू तट स्थित फटिकशिला है। यहां पांच दशक से अखंड नाम संकीर्तन का आयोजन होता आ रहा है। इसकी स्थापना विख्यात तपस्वी नारायण दास ने की थी। बिहार के बगही नामक स्थान पर बेहद साधारण परिवार में जन्मे नारायणदास का जीवन राम नाम के चमत्कार का परिचायक है। राम नाम के प्रति अनुराग बढ़ा तो वे 1978 में अपने आराध्य की नगरी अयोध्या आ पहुंचे। यहां भक्तों पर कृपा करने वाले करिश्माई संत के रूप में उनकी पहचान थी। 2002 में उन्होंने यहां अंतिम सांस ली, लेकिन अखंड रामधुन, नामोपासना और सेवा केंद्र के रूप में उन्होंने जिस आध्यात्मिक प्रतिष्ठान की स्थापना की, वह निरंतर उन्नत होता जा रहा है।
छह पालियों के लिए नियुक्त हैं संत-श्रद्धालु
नामोपासना के मुख्य केंद्रों में मणिरामदास जी की छावनी शामिल है। यहां छह दशक से अहर्निश रामधुन गूंज रही है। 24 घंटे के बीच छह पालियों में तीन से चार संत-श्रद्धालु अखंड राम धुन का क्रम आगे बढ़ाने के लिए नियुक्त हैं। रामकोट स्थित पौराणिक दशरथमहल में पिछले 26 सालों से अखंड रामनाम संकीर्तन संचालित है। बिदुगाद्याचार्य महंत देवेंद्रप्रसादाचार्य 1997 में इस पीठ के आचार्य नियुक्त गए और तभी से दशरथमहल में भी अखंड रामधुन की धारा प्रवाहित होने लगी जो अविराम जारी है।
जानकी महल में 1983 से चल रहा क्रम
इसी तरह जानकी महल ट्रस्ट में चार दशक से अखंड नाम संकीर्तन का आयोजन होता आ रहा है। यहां अखंड रामधुन 1983 से ही चल रही है। सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी में भी 24 घंटे रामनाम का संकीर्तन होता आ रहा है। यहां दशकों से नामोपासना का यह क्रम जारी है। इनके अलावा अन्य कई ऐसे स्थान हैं जहां कई पीढि़यों से अखंड रामधुन गूंजती आ रही है। फटिक शिला के महंत सुकदेव दास ने कहा कि भगवान शंकर स्वयं कहते हैं कि रामनाम संपूर्ण सहस्त्रनाम के समान है। अयोध्या में निरंतर अखंड नाम संकीर्तन का ही असर है कि हम भव्य राममंदिर के साक्षी बन पा रहे हैं।
रामनाम का बैंक व रामनाम का स्वतंत्र मंदिर भी
रामनगरी के अनन्य अनुराग का परिचायक सीताराम नाम बैंक भी है। मणिरामदास जी की छावनी सेवा ट्रस्ट की ओर से संचालित सीताराम नाम बैंक में खरबों बार राम नाम लेखन से युक्त काॅपियां जमा हैं, तो प्राचीन कालेराम मंदिर में राम नाम मंदिर के रूप में एक स्वतंत्र उप मंदिर है। यहां 15 करोड़ राम नाम लेखन एक बड़े संदूक में चिन्मय-चैतन्य विग्रह के रूप में संरक्षित है। प्राचीन पीठ अशर्फी भवन में भी श्रीराम कृतु स्तंभ की स्थापना की गई है जिसकी नींव में 28 करोड़ राम नाम को समाहित किया गया है।