राघव मंदिर में सजा भगवान का भव्य विग्रह।
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अयोध्या। कोरोना के कहर के चलते रामनगरी में करीब 350 वर्षों की परंपरा उस समय टूट गई, जब प्रशासन ने जगन्नाथ रथयात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। संतों ने वर्षों की परंपरा का निर्वहन करते हुए प्रतीकात्मक रूप से अपने मंदिरों के परिसर में ही यात्रा निकालकर परंपरा का निवर्हन किया। मणिरामदास की छावनी, रामकचहरी मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, दशरथमहल बड़ास्थान सहित अन्य मंदिरों से निकलने वाली रथयात्रा इस वर्ष नहीं निकल सकी।
जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव के क्रम में रामनगरी के करीब दर्जन भर मंदिरों से हर वर्ष भव्य रथयात्रा निकाली जाती थी लेकिन इस वर्ष कोरोना के कारण प्रशासन ने रथयात्रा निकालने की अनुमति नहीं दी। जिसके बाद रामनगरी के संतों ने अपने-अपने मंदिर के परिसर में ही भगवान के स्वरूपों को रथ पर बिठाकर प्रतीकात्मक रथयात्रा निकालकर परंपरा का निवर्हन किया।
रामजन्मभूमि परिसर से सटे जगन्नाथ मंदिर के महंत राघव दास ने बताया कि प्रशासन की अनुमति नहीं मिलने के कारण रथयात्रा नहीं निकाली जा सकी। परंपरा है कि यदि जगन्नाथ भगवान को रथ पर आरूढ़ नहीं कराया जाएगा तो उनकी पुर्नप्रतिष्ठा करनी पड़ेगी, जो कि संभव नहीं है। इसलिए मंदिर परिसर में ही रथ सजाकर उसमें भगवान जगन्नाथ को विधिविधान पूर्वक पूजन-अर्चन कर आरूढ़ कर प्रवेश द्वार तक निकालकर वापस मंदिर में प्रवेश करा दिया गया।
रामकचहरी मंदिर के महंत शशिकांत दास ने बताया कि मंदिर में विराजमान जगन्नाथ भगवान का भव्य-पूजन अर्चन श्रीरामबल्लभाकुंज के अधिकारी राजकुमार दास के पावन सानिध्य में किया गया। बताया कि प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं मिलने के कारण इस वर्ष रथयात्रा का उत्सव संभव नहीं हो पाया है। महंत शशिकांत दास कहते हैं कि कोरोना महामारी की वजह से करीब 350 वर्ष पुरानी परंपरा टूट गयी है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने रुचि नहीं दिखाई, नहीं तो नियमों का पालन करते हुए रथयात्रा निकाली जा सकती थी।