कड़ाके की ठंड और कोहरे का सीधा असर आलू और टमाटर पर पड़ रहा है। आलू में झुलसा रोग लगने की आशंका बढ़ गई है। तो टमाटर पर पाला से पत्तियां झुलसने लगी हैं। यदि धूप नहीं निकला तो फंगसजनित इस रोग से फसलें पूरी तरह से बरबाद हो जाएंगी।
सात दिनोें से घने कोहरा से आलू की फसल पर भूरे रंग के चकत्ते पड़ रहे हैं, यह रोग पूरे खेत में दिखने लगा है। इस वर्ष जिले में चार हजार पाच सौ हेक्टेयर भूमि पर आलू की फसल आच्छादित है।
मड़ना के रहने वाले राम निहोर यादव ने बताया कि इस वर्ष आलू की बोआई देर से हुई है। यदि ऐसा मौसम रहा तो आलू की उपज बर्बाद होगी। दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है, लेकिन धूप नहीं निकली तो दवाओं का भी कोई खास असर नहीं होगा।
ऐसा ही कहना बासगांव के बजरंगी वर्मा का भी है। यदि इसे फौरी तौर पर नियंत्रित नहीं किया गया देखते देखते पूरे खेत में यह रोग फैल जाता है। इस रोग में आलू के पौधों की डंठलों पर सड़न शुरू हो जाती है और फसलों में सड़न शुरू हो जाती है।
सहायक जिला कृषि रक्षा अधिकारी आरडी वर्मा ने बताया कि किसान फिनोमिडेन, मैंकोजेब और साइमोक्सेनिल दवा का प्रयोग कर आलूू और टामटर की फसल को बचा सकते हैं। ब्लॉक स्तरीय कृषि रक्षा इकाई पर दवाएं उपलब्ध हैं। किसान अनुदान पर दवाएं लेकर आलू की फसल पर छिड़काव कर सकते हैं।
नरेन्द्र देव कृषि विवि कुमारगंज के वैज्ञानिक मिथलेश पांडेय का कहना है कि आसमान में बदली, धूप का न निकलना और औसत तापमान 10 से 15 डिग्री सेल्सियस के बीच में रहे तो निश्चित ही आलू की फसल में झुलसा रोग लगेगा। इसके किसी भी फंगसजनित दवाओं का प्रयोग कर सकते हैं। मैकोजेब इसके लिए मुफीद दवा माना जाता है।
जिला उद्यान अधिकारी पारसनाथ कहते हैं कि आलू की फसल पर पिछैती झुलसा का प्रकोप क्षेत्र में देखा जा रहा है। किसानों ने खेत में झुलसा रोग लगने की शिकायत की है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए किसानों को फसल की हल्की सिंचाई करने के साथ साथ दवाओं का छिड़काव करने की सलाह दी जा रही है।