यह कार्रवाई विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से हाईकोर्ट के ताजा फैसले के अनुपालन में होने वाली है। इसके लिए नोटिस देने की तैयारी की जा रही है। एक सप्ताह में इस पर अमल होगा।
मामले में पहले ही विश्वविद्यालय ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए सीटों के अधिक दाखिले पर कार्रवाई शुरू की थी तो, चार कॉलेजों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में याचिका की थी।
मगर हाईकोर्ट ने 28 अगस्त को याचिका पर सुनवाई कर विश्वविद्यालय के पक्ष में निर्णय देते हुए याचियों पर एक-एक लाख जुर्माना भी लगाया है। साथ ही नुकसान के लिए छात्रों से केस करने का विकल्प भी दिया है।
अब विवि प्रशासन का कहना है कि जल्द नोटिस देकर अधिक प्रवेश रद्द होंगे। ज्ञात हो कि वर्ष 2015 की वार्षिक परीक्षाओं में निर्धारित सीटों से अधिक प्रवेश प्रदान करने वाले कई महाविद्यालय व संबंधित छात्रों ने उच्च न्यायालय में एक दर्जन से अधिक वाद दायर करते हुए परीक्षाओं में सम्मिलित होने का अनुरोध किया था।
इस संदर्भ में विश्वविद्यालय पर स्वेच्छाचारिता से सीटों के निर्धारण का आरोप मढ़ा था। इस परिप्रेक्ष्य में दायर की गई समस्त याचिकाएं एक साथ जोड़ कर सुनवाई हुई।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि न्यायमूर्ति राजन राय ने उक्त याचिकाओं के संदर्भ में 28 जुलाई को अंतिम निर्णय सुरक्षित कर लिया जो 31 अगस्त को निर्गत हुआ।
अपने ऐतिहासिक निर्णय मे न्यायमूर्ति ने प्रवेश संबंधी अधिनियम/परिनियम की व्याख्या करते हुए इसे एएफआर श्रेणी में रखा है। ज्ञात हो कि किसी याचिका के संबंध में एएफआर निर्णयों को ला-जर्नल्स तथा विधि-पत्रिकाओं द्वारा भविष्य में संदर्भित किए जाने के लिए प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।
न्यायमूर्ति ने याचिका दायर करने वाले महाविद्यालयों क्रमश: रवीन्द्र सिंह स्मारक महाविद्यालय, गोंडा, विमला विक्रम पीजी कॉलेज, बलरामपुर तथा श्रीमती दशरथ देवी महाविद्यालय, अमेठी पर विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित सीटों से अधिक प्रवेश करने पर छात्रों को होने वाले नुकसान को ध्यान में रखते हुए एक-एक लाख रुपये हर्जाने स्वरूप कोर्ट में जमा करने का आदेश दिया है।
कहा कि यदि संबंधित याचिकाकर्ता महाविद्यालय ऐसा नहीं कर पाते हैं तो यह धनराशि उनसे भू-राजस्व नियमों के अंतर्गत वसूली जाएगी।
साथ ही न्यायमूर्ति ने अपने आदेश में यह भी लिखा है कि संबंधित महाविद्यालय ऐसे समस्त प्रवेशित छात्रों का शुल्क वापस करें तथा विश्वविद्यालय शुल्क वापसी की प्रक्रिया पर निगरानी रखे।
साथ ही आदेश में छात्रों को स्वतंत्रता प्रदान की है कि वे चाहें तो संबंधित महाविद्यालयों से शैक्षणिक सत्र के हास हेतु उचित क्षतिपूर्ति दिए जाने के लिए आवेदन/केस कर सकते हैं।
ऐतिहासिक निर्णय में विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा 28 तथा विश्वविद्यालय परिनियम की धारा 11,26 व 11.27 को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय की प्रवेश-समिति तथा प्रवेश प्रक्रिया के संबंध में प्रवेश समिति द्वारा गठित विभिन्न उप-समितियां प्रवेश-प्रक्रिया के किसी भी पक्ष, चाहे वह सीटों के निर्धारण संबंधी ही क्यों न हो, के संदर्भ में निर्णय लेने हेतु सक्षम है।
साथ ही विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा 28 के अंतर्गत प्रदत्त शक्तियों के आधार पर विश्वविद्यालय के कुलपति नियमों का उल्लंघन होने पर किसी भी प्रवेश को कभी भी निरस्त कर सकते हैं।
इस ऐतिहासिक निर्णय में माननीय न्यायमूर्ति ने प्रवेश प्रक्रिया संबंधी राज्य सरकार के आदेश 7 अक्तूबर 2014 सहित पूर्व के कई महत्वपूर्ण न्यायालयीय आदेशों को संदर्भित करते हुए विभिन्न महाविद्यालयों तथा छात्रों द्वारा दायर याचिकाओं को निरस्त कर दिया।
साथ ही राज्य सरकार व विश्वविद्यालय को आदेश दिया है कि किन-किन महाविद्यालयों ने अनुमन्य क्षमता से अधिक प्रवेश लिया है।
उन्हें चिह्नित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करें। उच्च न्यायालय के उक्त निर्णय के फलस्वरूप अवध विश्वविद्यालय द्वारा सीटों के निर्धारण के संबंध में अपनायी गई प्रक्रिया की पुष्टि होने के साथ-साथ भविष्य में समस्त राज्य विश्वविद्यालयों के प्रवेश-प्रक्रिया के संदर्भ में होने वाले तमाम संभावित विवादों पर पूर्ण विराम लग गया है।
अवध विवि के मीडिया प्रभारी एसएन शुक्ल ने कुलपति प्रो. जीसीआर जायसवाल के हवाले से हाईकोर्ट के आदेश की जानकारी देते हुए कहा कि अब संबंधित कॉलेजों में हुए सीटों से अधिक दाखिले पर नोटिस जारी करके कार्रवाई होगी। इसकी प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी किए जा रहे हैं।