लालकिले से प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा से सभी क्षुब्ध हैं। कहना है कि इस बार पूरी उम्मीद थी कि लागू होने का ऐलान होगा, मगर धोखा हुआ।
पूर्व सैनिक मानते हैं कि वन रैंक वन पेंशन न मंजूर होने से अब जीवकोपार्जन के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। सबसे खराब हालात सैनिकों की विधवाओं का है।
पेंशन कम होने की वजह से उनके परिवार के बच्चों का भरण-पोषण भी ढंग से नहीं हो पा रहा है। पहले कांग्रेस और अब भाजपा सरकार भी सिर्फ वादे कर रही है।
जनवरी 1969 में सेना में भर्ती हुए इतकाद हुसैन ने कहा कि सीमा पर खड़ा होने के बाद पता चलता है कि जिंदगी क्या है। देश की सेवा करने में तनिक भी हिचक नहीं होती है।
जान जाए या रहे सैनिकों के लिए कोई मायने नहीं रखता है। समस्या तब सामने आती है जब सैनिक रिटायर होकर घर लौटता है और उसकी पेंशन की विसंगतियां कुंठा बना देती है।
जो सैनिक पूर्व में रिटायर हुए उन्हें कम पेंशन मिल रही है और जो बाद में रिटायर हुए उन्हें अधिक पेंशन दी जा रही है। मोदहा स्थित कौशलपुरी निवासी सूबेदार मेजर यूके द्विवेदी ने हमारे जो साथी सीमा पर शहीद हो गए।
उनकी विधवाओं को इतनी पेंशन नहीं मिल रही है कि वह अपना व अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें। वन रैंक वन पेंशन के लिए इसीलिए संषर्ष किया जा रहा है, ताकि शहीदों की विधवाएं समाज में सही ढंग से जीवन यापन कर सकें।
स्टेट बैंक कॉलोनी निवासी नायक चंद्रभान तिवारी का कहना कि यदि वन रैंक वन पेंशन योजना लागू हो जाए तो सभी को समान पेंशन मिलेगी। इससे संघर्ष की कोई बात नहीं रह जाएगी। सरकारों ने छला है।
सदर बाजार के हवलदार अमीर हमजा कहते हैं कि एक ही पद से रिटायर होने वाले सैनिकों को अलग-अलग पेंशन दी जा रही है। उन्होंने कहा कि जो बाद में सेना में भर्ती हुए उनके और हमारी पेंशन में जमीन आसमान का अंतर है।
सरकार सौतेला व्यवहार कर रही है। सभी को एक जैसी पेंशन मिलनी चाहिए। ऐसा ही कहना रायपुर निवासी ओम प्रकाश सिंह का है।
लालबाग कॉलोनी निवासी कृपा शंकर जायसवाल ने केन्द्र की सरकार पर दोषारोपण किया। कहा कि सरकार पूर्व सैनिकों के साथ छल कर रही है। उन्होंने कहा कि रिटायर हुए दस वर्ष बीत गए।
वन रैंक वन पेंशन के लिए लड़ रहे हैं। पहले सीमा पर लड़ा और अब हक के लिए लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उम्मीद अभी कायम है। सरकार कभी तो चेतेगी। उनकी माने तो जल्द ही सामन पेंशन योजना लागू कर दिया जाएगा।