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Ayodhya News: कुबेर टीले पर जमा होते थे कारसेवक, बनती थी रणनीति

Mon, 01 Jan 2024 12:08 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
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सतीश पाठक
अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि के पीछे स्थित कुबेर टीला मंदिर आंदोलन का जीता-जागता गवाह है। वर्ष 1986 से 1992 तक यहां पर कारसेवक इकट्ठा होते थे। अधिक ऊंचाई पर होने से अयोध्या के भौगोलिक स्थिति की जानकारी होती थी। आंदोलन को धार देने के लिए रणनीति भी बनाई जाती थी।
श्रीराम जन्मभूमि परिसर के दक्षिणी-पश्चिमी किनारे पर स्थित कुबेर टीले का पौराणिक महत्व है। ग्रंथ रुद्रयामल के अनुसार युगों पूर्व यहां धन के देवता कुबेर आए थे। उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की थी। बाद में नौ देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गई। वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) का संरक्षित स्मारक है।
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श्रीराम मंदिर आंदोलन शुरू होने पर विवादित स्थल तक पहुंचने वाले मार्गों, अगल-बगल के स्थलों आदि को जानने के लिए कारसेवकों ने कुबेर टीले को ही ठिकाना चुना। वर्ष 1986 में पहली बार कारसेवक यहां पहुंचे तो उन्हें यह उपयुक्त स्थान लगा। तभी से यहां कारसेवकों की बैठकें होती रहीं।
कारसेवकों की मदद करते थे जग्गू
बाबरी विध्वंस के मुख्य आरोपी रहे कारसेवक संतोष दुबे ने बताया कि कुबेर टीले पर पहली बार पांच कारसेवक पहुंचे तो जग्गू नामक एक कर्मचारी मिले, जो तुलसी उद्यान के निकट रहते थे। जग्गू को लक्ष्य की जानकारी नहीं दी गई। बाटी-चोखा के कार्यक्रम के बहाने दो-तीन घंटे समय बिताया जाता था। वर्ष 1986 से लगभग 22 बैठक यहां की गई। अक्तूबर, 1992 की आखिरी बैठक में भीटी के दुर्गा पहलवान, बस्ती के वशिष्ठ गोयल, रविशंकर पांडेय, बस्ती के भीष्म पितामह पांडेय, इलाहाबाद के हंडिया के नरेंद्र प्रताप सिंह आदि शामिल हुए थे।
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आस्था के साथ पर्यटन का केंद्र बन रहा कुबेर टीला
श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कुबेर टीला को आस्था के साथ पर्यटन केंद्र बनाते हुए विकसित करा रहा है। यहां पक्षीराज जटायु का मंदिर बन गया है। भगवान शिव व कुबेर के मंदिरों का सुंदरीकरण कराया जा रहा है। वर्ष 1993 में अधिग्रहण से पूर्व चुनिंदा दार्शनिक स्थलों में शामिल रहने वाला यह स्थल अब अपने पुराने गौरव को प्राप्त कर रहा है।
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