शहीद की पत्नी शीला पांडेय गुजरे हुए लम्हों को याद कर सिहर उठती हैं, लेकिन चेहरे पर विजय का भाव उभर आता है। कहती हैं कि दो बेटियां व एक बेटा है।
इनको पढ़ा-लिखाकर देश सेवा लायक बनाना है। उन्होंने बताया कि बात सन 1999 की है। गर्मी का सीजन था, कि पति जगदंबा पांडेय की टुकड़ी को कारगिल की चोटी की सुरक्षा के लिए भेज दिया गया।
दुश्मन का नापाक इरादा कारगिल की चोटी पर कब्जा हासिल करना था। सेना ने ऑपरेशन रक्षक घोषित किया और उनके पति समेत अन्य ने मोर्चा संभाल लिया।
मूल रुप से भदौली गांव की रहने वाली तथा वर्तमान में शहर के दीन दयाल कॉलोनी में रह रही शीला पांडेय ने बताया कि 14 मार्च को उनके पति शहीद हो गये।
शहादत पर सरकार की ओर से सेना मेडल प्रदान किया गया। इसके कुछ दिनों बाद ही सरकार की ओर से ऑपरेशन विजय की घोषणा की गई।
देश की सीमाओं की रक्षा में प्राणों की आहुति देने वाले अथवा अदम्य साहस व वीरता का प्रदर्शन करने वालों पर नजर डालें तो लंबी सूची नजर आती है।
जिले के ही अभिमन्यु सिंह ने चाइना वार में 18 दिनों तक विपक्षी सेना की कैद झेली। इसी श्रेणी में सूबेदार आरके त्रिपाठी का नाम लिया जाता है।
वर्ष 1965 की लड़ाई में सोहावल तहसील के बड़ागांव निवासी देवी प्रकाश सिंह की वीरता तथा साहस के चर्चे अभी भी आम हैं। कारगिल की चोटी की रक्षा में वीरता का प्रदर्शन करने वालों में मो. वजूद खान, एसपी सिंह, परशुराम सिंह व बाबूराम सिंह शामिल हैं।