जिला अस्पताल में हड़ताल के दूसरे दिन बुधवार को नर्सों ने काम संभाल लिया, मगर फार्मासिस्ट और लैब टेक्नीशियनों ने कार्य बहिष्कार जारी रहा। इसका असर हुआ कि मरीजों को पूरे दिन न दवाएं मिली न ही कोई पैथालॉली जांच हो पाई।
ओपीडी में कुल 650 रोगियों ने इलाज कराया, जिन्हें जांच कराने व दवाएं दिलाने के लिए निजी जांच केंद्र व दवाखाने के दलालों की चांदी रही। हालांकि शासन से एस्मा लागू होते ही हड़ताल रद्द कर दोपहर बाद एलटी व फार्मासिस्ट भी काम पर आते दिखे।
बुधवार को सुबह आठ बजे अस्पताल खुल गया। चतुर्थश्रेणी कर्मचारी और स्टाफ नर्सें ड्यूटी पर लौट आईं, जिसके चलते पर्ची बनने लगी व डॉक्टरों के कक्ष खुल गए और ओपीडी चालू हो गई। लेकिन पैथालॉजी और डिस्पेंसरी में ताला बंदी के चलते मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ी।
पैथालॉजी में ताला लगा होने की वजह से मरीजों को बाहर से जांच करानी पड़ी। इस दौरान ब्लड बैंक भी बंद रहा। बड़ागांव निवासी नवमीलाल का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ था। उन्हें घबराहट हो रही थी। चेहरे पर पसीना छलक रहा था। ओपीडी में पहुंचे पर डा. आरपी राय ने पांच दवाएं बाहर से लिख दीं।
मरता क्या न करता। उसने मेडिकल स्टोर पर जाकर दवाएं खरीदीं। रुदौली की रहने वाली बेबी (18) के पेट में दर्द था। वह पिछले पांच दिनों से परेशान है। सर्जरी में दिखाया तो उन्हें दूसरे कक्ष में भेज दिया गया।
बेबी ने फीजिशियन डा. आरपीएन सिंह को दिखाया तो उन्होंने भी तीन दवाएं बाहर की लिख दीं। यह दो मरीज महज एक उदाहरण भर हैं। अस्पताल में बुधवार को 650 रोगियों से पर्ची कटवाई थी और सभी को बाहर से दवाएं लिखी गईं।
और तो और सांप और बंदर काटे मरीजों को भी इंजेक्शन नहीं लग सका। स्वाती पांडेय (6) को कुत्ता काट लिया था। उनकी मां मीनू बच्ची को इंजेक्शन लगवाने के लिए जिला अस्पताल आई। ओपीडी में उन्हें एंटी रैबीज इंजेक्शन लिख दिया गया, लेकिन काउंटर पर कोई इंजेक्शन लगाने वाला नहीं मिला।
उन्होंने भी बाहर से इंजेक्शन खरीद कर लगवाया। यही हाल प्रीति (16) और सुनीता मौर्या (35) का रहा। एंटी रैबीज इंजेक्शन के लिए ये दोनों भटकती नजर आईं। प्रमुख अधीक्षक डा. हरिओम श्रीवास्तव ने बताया कि सभी संवर्ग के कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त हो गई है। गुरुवार से मरीजों को सभी जांचें और दवाएं फ्री में मिलेंगी।