नागरिक सुविधाओं की कमी से अभी भी लोग परेशान हैं। समय से बिजली आती नहीं, आने के बाद कब चली जाएगी, यह भी निश्चित नहीं रहता। स्वच्छ जलापूर्ति अभी भी नहीं हो पा रही है। सड़क, नाली और खंडंजा आदि की समस्या से अभी भी लोग दो-चार हो रहे हैं।
सरकारी स्कूल हैं, अस्पताल हैं, पर असुविधा इस कदर है कि लोग प्राइवेट क्षेत्र में ही पढ़ाई के साथ ही दवाई को आखिर क्यों महत्व दे रहे हैं? यानि कि सरकारी तंत्र में कुशासन इस कदर बढ़ गया है कि लोगों का भरोसा कम हो गया है।
रेलवे स्टेशन पर रविवार को अमर उजाला के वोटर अड्डा में यात्रियों ने कुछ ऐसा ही राय व्यक्त की। एक यात्री ने कहा कि अभी कुछ दिन पहले हमें कुलाधिपति स्वर्णपदक मिला है। यदि स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर होते तो हमें बाहर जाकर नौकरी के लिए भटकना नहीं पड़ता।
जनप्रतिनिधि ऐसा हो स्थानीय स्तर पर ऐसा माहौल क्रियेट करे कि यहीं पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के कारखाने खुल जाएं। गांवों में खुले परिषदीय स्कूलों की दुर्दशा पर एक यात्री ने कहा कि बिल्डिंग तो बनी है, शिक्षकों की भी तैनाती है, फिर भी गांव में जिनके पास फीस जमा करने की क्षमता है, वे प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला करा देते हैं।
यही हाल सरकारी चिकित्सालयों का भी है। कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ता है फिर भी रोगी अच्छी सुविधा के कारण निजी नर्सिंग होम की ओर ही इलाज के लिए जाता है। जनप्रतिनिधि ऐसा हो जो हर जगह व्याप्त कुशासन को समाप्त कर दे।
बिजली, नाली, खड़ंजा, स्वच्छता, आदि मुद्दों पर भी यात्रियों ने खुल कर अपनी राय व्यक्त की। एक यात्री ने कहा कि आजादी के इतने वर्ष बीत गए, हमारी सरकारें ठीक से हर नागरिक तक बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाने में असफल रही। नेता ऐसा हो जो बुनियादी सुविधाओं को दिलाने के प्रति बेहद संवेदनशील हो।