हनुमतनगर में रामलीला के दौरान मंचस्थ कलाकार।
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सन् 1978 तक रामनगरी में धूम मचाने वाली ‘रामलीला’ संकट में है। शहरों से लेकर गांवों और बाजारों में होती रामलीलाओं की जगह मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित होने लगी हैं। मरती ‘रामलीलाओं’ को जीवंत करने की बात तो दूर, सांस लेतीं ‘समितियों’ को आक्सीजन देने भी कोई आगे नहीं आ रहा है।
रामनगरी में रामलीलाओं को महत्व न देने के कारणों में उम्दा पात्रों के साथ ही अर्थ का गंभीर अभाव है। राम, लक्ष्मण और सीता की भूमिका के लिए हाई स्कूल तक के विद्यार्थी तो मिल जाते हैं, लेकिन कुंभकर्ण, रावण, मेघनाद और हनुमान की भूमिका के लिए न तो कोई मुखौटा लगाना चाहता है, न वैसी कद काठी के पात्र ही मिलते हैं।
फतेहगंज और चौक की समितियां तो अब पेशेवर मंडलियां बुलाती हैं। कुछ शोभायात्रा में स्थानीय बच्चों को ही राम, सीता, लक्ष्मण की भूमिका में प्रस्तुत किया जाता है। हैदरगंज समिति तो रामायण सीरियल को बड़े पर्दे पर दिखाती है।
वजीरगंज रामलीला समिति में वहीं के हनुमान मंदिर के महंत हनुमान की भूमिका में आते हैं। नगर से बाहर मुमताजनगर बाजार में श्रीरामलीला रामायण समिति हिंदू-मुस्लिम एकता की खुशबू आज भी बिखेर रही है।
यहां समिति में दोनों धर्मों के पदाधिकारी तो रहते ही हैं, कलाकारों में भी इनकी भरमार रहती है। रामलीला समिति के कोषाध्यक्ष राजेश कुमार तिवारी कहते हैं कि इस बार उनके यहां दोनों धर्मों के पात्रों के सहारे छह अक्तूबर से शुरू हो रही है।