अयोध्या। कोरोना वायरस ने न सिर्फ लोगों के तौर तरीके बदले हैं, बल्कि इसका असर गर्भवती महिलाओं व उनके परिवारीजनों पर भी पड़ा है। कोरोना काल के आंकड़ों पर गौर करें तो सीजेरियन प्रसव के बजाय इस समय नार्मल प्रसव पर ज्यादा जोर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही प्रथा यदि चलन में रही तो गर्भवतियों के लिए भविष्य में एक सुखद पहलू होगा।
जिले की आबादी करीब 29 लाख है। इनमें आधी आबादी के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के अलावा तमाम नर्सिंग होम संचालित हैं। सीएचसी-पीएचसी सहित स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर तो संसाधनों के अभाव में नार्मल प्रसव ही हो पाते हैं, जबकि सीजेरियन के लिए जिला महिला अस्पताल रेफर करना बेहतर माना जाता है।
लेकिन नर्सिंग होम के प्रति आमजन की धारणा है कि यहां अधिकांश सीजेरियन प्रसव ही होते हैं। इधर, लॉकडाउन में नर्सिंग होम बंद हुए तो पहले से इलाज करा रही गर्भवती को देखने से भी निजी अस्पतालों ने मना कर दिया।
कुछ को अनुमति मिली भी तो संक्रमण के भय से चिह्नित अस्पतालों ने भी इलाज करने से हाथ खड़े किए। इन सबके बावजूद संक्रमण की आशंका में परिवारीजनों ने गर्भवतियों को स्थानीय सीएचसी-पीएचसी के साथ स्वास्थ्य उपकेंद्र व अधिक गंभीर मामले को जिला महिला अस्पताल तक पहुंचाया। जिसका नतीजा रहा कि पूरे गर्भधारण के दौरान जिन मामलों में सीजेरियन ऑपरेशन के दावे किए गए थे। उनमें से अधिकांश प्रसव नार्मल ही हो गए। इससे गर्भवतियों के लिए भी बेहतर रहा। साथ ही अधिक समय तक अस्पताल में न रुकने से संक्रमण से भी बचत हुई।
सीजेरियन प्रसव में खर्च होते हैं 25 से 50 हजार
जानकारी के मुताबिक अमूमन नर्सिंग होम में सीजेरियन प्रसव के लिए 25 से 35 हजार रुपये तक तीमारदारों से लिए जाते हैं। तीसरा ऑपरेशन व अन्य गंभीर मरीजों के लिए जांच, आईसीयू आदि सुविधाओं के नाम पर यह रकम बढ़कर 50 हजार तक हो जाती है। दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में हर तरह की डिलीवरी पूर्णतया नि:शुल्क होती है। साथ ही जननी सुरक्षा योजना व मातृत्व वंदना योजना के तहत आर्थिक लाभ भी होता है।