कोई परिवार के बोझ से परेशान होकर कम उम्र में बचपन को भुला मेहनत-मजदूरी
को विवश है तो किसी को इसी में अपनी जिंदगी नजर आती है।
रेस्त्रां, होटल,
ढाबा व चाय के ठेले पर काम करने वाले बाल मजदूर मानसिक, शारीरिक व आर्थिक
शोषण के शिकार हैं। ग्राहकों से लेकर दुकान मालिक की दुत्कार उनके जिंदगी
का हिस्सा बन गई है।
सरकार की ओर से बाल मजदूरी रोकने के लिए श्रम विभाग को
कड़ाई से अंकुश लगाने के निर्देश दिया गया है, लेकिन बाल मजदूरी पर रोग
नहीं लग पा रही है।
रिकाबगंज क्षेत्र स्थित एक प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट पर काम कर रहे बालक को बुलाकर पूछने कि कहां के रहने वाले हो, तो वह सन्नाटा खींच लेता है। कुरेदने पर बस इतना बताता है कि नौराही (रौनाही थाना क्षेत्र) का। पढ़ते क्यों नहीं? काम क्यों कर रहे हो? इस सवाल पर तपाक से कहता है कि पेट पालने की मजबूरी है।
घर वालों ने कमाने के लिए भेजा है। काम तो करना ही पड़ेगा। चौक घंटाघर क्षेत्र स्थित एक बिरयानी के ठेले पर तीन-चार लड़के काम कर रहे हैं। कैमरा निकालते ही बच्चों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती है।
फोटो खिंचाते हैं। पूछने पर बताते हैं कि दो पैसे की खातिर श्रम करना पड़ता है। आखिर पढ़-लिखकर कौन नौकरी मिल जाएगी और साहब बन जाएंगे? नाम-पता पूछने पर बच्चे इधर-उधर खिसकने लगते हैं।
उनमें से एक ने अपने आप को गोंडा के तरबगंज का निवासी बताया है। सिविल लाइंस स्थित एक दक्षिण भारतीय व्यंजन के ठेले पर व्यंजन निर्माण से लेकर ग्राहकों को परोसने तथा जूठे बरतन व दोना-पत्तल समेटने का काम बच्चों के जिम्मे है।
बमुश्किल पांच साल का बच्चा जूठन बटोर रहा था। उसका नाम पूछा तो पहली बार में अनसुना कर दिया। दो-तीन बार पूछने पर भी अपना नाम नहीं बताया। मां-बाप और घर आदि के बारे में पूछने पर बस इतना सा जवाब दिया कि बाबू जी काम करने दो। इतना कहकर दूसरी ओर खिसक लेता है।
उपश्रमायुक्त डीएस त्रिपाठी कहते है कि विभाग की ओर से बाल श्रम उन्मूलन के लिए लगातार अभियान चलाया जाता है। विभाग की प्रवर्तन टीमों की ओर से व्यापक पैमाने पर कार्रवाई भी की गई है।
प्रवर्तन दस्ता बाल श्रम उन्मूलन के लिए प्रतिष्ठानों पर छापेमारी करता है और मुक्त कराये गये बालकों को उनके परिवारीजनों के हवाले किया जाता है। बाल मजदूरी कराने वाले प्रतिष्ठान व दुकान संचालक के खिलाफ जुर्माना लगाया जाता है तथा रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है।