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नहाय-खाय के साथ छठ पर्व का शुभारंभ

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अयोध्या। सूर्य की उपासना और पूर्वांचल के महापर्व सूर्य षष्ठी डाला छठ पर्व का उल्लास शहर में छलकने लगा है, उत्सव की रौनक बढ़ गई है। चार दिवसीय चार दिवसीय इस उत्सव की शुरूआत गुरुवार को नहाय खाय के साथ हुई। सूर्य उपासना का यह व्रत संतान प्राप्ति तथा दुख पाप के नाश व संपन्नता के लिए किया जाता है। मूल रूप से बिहार, झारखंड व छत्तीसगढ़ प्रांत तथा इसके सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रचलित छठ पर्व पर्व कई सालों से जुड़वा शहरों में भी धूमधाम से मनाया जाता है। पर्व को लेकर बाजारों में हलचल बढ़ गई है।
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छठ पर्व गुरुवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ। शुक्रवार को खरना छोटी छठ मनाई जाएगी। शनिवार को सौभाग्यवती महिलाएं निर्जला व्रत रखकर पुत्र प्राप्ति और पति की दीर्घायु को डूबते सूरज को कमर भर तक पानी में खड़े होकर अर्घ्य देकर मंगलकामना की प्रार्थना करेंगी। राविवार को महिलाएं पवित्र नदियों में कमर भर तक खड़ी होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करेगी। अयोध्या के सरयू तट व फैजाबाद के गुप्तारघाट पर महिलाएं छठ का पूजन करती हैं।
रामनगरी अयोध्या में इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं, भगवान सूर्यनारायण की भव्य झांकी भी सजती है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में भी छठ पर्व को लेकर उल्लास छलकने लगा है, घर-घर में वेदियां सजाकर पूजन अर्चन शुरू कर दिया गया है। शास्त्रों, पुराणों में छठ पर्व को लेकर तमाम कथाएं प्रचलित हैं।
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मान्यता है कि जो भी इस महाव्रत को निष्ठाभाव से विधिपूर्वक संपन्न करता है, वह संतान सुख से कभी वंचित नहीं रहता है। पौराणिक कथा के मुताबिक, जब पांडव जुएं में अपना सारा राजपाट हार गए तब द्रोपदी ने छठ का व्रत रखा और पांडवों को अपना राजपाट मिल गया। वहीं, एक अन्य कथा के मुताबिक छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए सूर्य की आराधना पवित्र नदियों के किनारे की जाती है।
चार दिवसीय डाला छल पर्व की शुरूआत हो गई है। ज्योतिषाचार्य आचार्य शिवेंद्र बताते हैं कि छठ का व्रत अत्यंत कठिन होता है। व्रती महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। इसमें महिलाएं बिस्तर का त्याग करती हैं। जमीन पर चटाई बिछाकर या लकड़ी के तख्त पर सोती है। कुछ घरों में नहाय-खाय से पहले रसोई से लहुसन, प्याज का प्रयोग भी बंद हो जाता है। ऐसे नए कपड़े पहने जाते हैं, जिसमें सिलाई न हो।
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