अयोध्या। भारत में हरित क्रांति के नाम पर रासायनिक उर्वरकों, हानिकारक कीटनाशकों, हाइब्रिड बीजों एवं अधिकाधिक भूजल उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति, उत्पादन, भूजल स्तर और मानव स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट आई है। बाद में आई विदेशी तकनीक जैविक खेती वर्मी कंपोस्ट, कंपोस्ट बायोडायनामिक भी जटिल होने के कारण अंतत: किसानों को बाजार पर ही निर्भर बनाती है। अत: आवश्यकता है कि प्राकृतिक कृषि पद्धति अपनाने की, जिससे किसान को बार-बार बाजार न जाना पड़े, उत्पादन न घटे, खेत उपजाऊ बने रहे व मानव रोगी न बने। यह बात नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कुमारगंज कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह ने कही।
उन्होंने शुक्रवार को ग्रामीण क्षेत्रों की उन्नत हेतु कार्यरत संगठन लोक भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बृजेंद्र पाल सिंह, राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री गोपाल, संपर्क प्रमुख श्रीकृष्ण चौधरी एवं विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के साथ विश्वविद्यालय द्वारा किसानों के कल्याण हेतु संकल्पित डेरी आदि फार्मों का अवलोकन किया। इसके बाद कुलपति के सभाकक्ष में एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्राकृतिक खेती के जीरो बजट तकनीक को किसानों के बीच और सुदृढ़ तरीके से पहुंचाने, पद्मश्री सुभाष पालेकर के प्राकृतिक कृषि अभियान के साथ किसानों की आय संवर्धन करने और प्रकृति क्षरण को रोकथाम के लिए चर्चा की गई।
कुलपति ने विवि के वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि गांवों में ज्यादा से ज्यादा जीवामृत, बीजामृत प्रयोग करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाए एवं विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्रों पर इसका प्रदर्शन किया जाए। बैठक में विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार डॉ. एपी राव, निदेशक शोध डॉ. गजेंद्र सिंह, वैज्ञानिक डॉ. एसपी सिंह, डॉ. सुबोध सचान, डॉ. जसवंत सिंह तथा छात्र रिषी सिंह, ऋषभ मिश्रा आदि उपस्थित रहे।