अयोध्या। श्रीराम के वनवास से जुड़ी तमसा नदी के लिए भारत सरकार से प्रथम पुरस्कार की घोषणा की गई है। यह पुरस्कार तमसा के पुनरूद्धार को लेकर की गई है। जलशक्ति मंत्रालय की ओर से घोषित नेशनल वाटर अवार्ड-2019 में इसे उत्तर भारत का पहला पुरस्कार दिया गया है। घोषणा के साथ ही इसके लिए जलशक्ति मंत्रालय की ओर से सूचना भेजी गई है।
अयोध्या से वनवास पर निकले श्रीराम ने पहली रात पौरामिक तमसा के तट पर ही बिताया था लेकिन समय के थपेड़ों से यह नदी लुप्तप्राय होती जा रही थी। पौरामिक नदी के पुनरूद्धार के लिए भगीरथ प्रयास दो जनवरी 2019 को शुरू हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तत्कालीन जिलाधिकारी अनिल कुमार पाठक, सीडीओ अभिषेक आनंद, डीसी मनरेगा नागेंद्र मोहन राम त्रिपाठी न इसकी शुरूआत कराई थी। तब कम हो लोगों को विश्वास था कि इतनी बड़ी नदी को भी जीवनदान मिल सकता है। लेकिन मजदूरों की कठिन मेहनत से इसका स्वरूप बदल गया।
जहां झाल झखाड़ थे वहा बारिश का पानी बह रहा है। मनरेगा और राज्य वित्त के तहत नदी की खोदाई का काम शुरू किया गया। लगभग पांच महीने में जिले में 151 किमी नदीं की खुदाई पूरी की गई तो बारिश में तमसा अपने पौराणिक स्वरूप में दिखने लगी। तमसा के पुनरूद्धार से कई लाभ हुए। जिले के मजदूरों को लगभग चार लाख मनव दिवस का रोजगार मिला। 151 किमी लंबी तमसा के किनारे हजारों एकड़ फसल की सिंचाई का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। तमसा भूगर्भ जल के रिचार्ज का बड़ा श्रोत बन गई।
पहले भी मिल चुका है तमसा को पुरस्कार
इसके पहले भी तमसा के पुनरूद्धार के लिए जल शक्ति मंत्रालय के तहत काम करने वाली संस्था एलिट्स वाटर इनोवेशन संस्था के जरिए दिया गया था। यह पुरस्कार अयोध्या के जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने पिछले 28 अगस्त को प्राप्त किया था। अब भारत सरकार का जल शक्ति मंत्रालय ने इसे पहला पुरस्कार प्रदान किया है।
ऋषि मांडव्य की तपस्या से उत्पन्न हुई थी तमसा
पौराणिक नदी तमसा रामायणकालीन ऋणि मांडव्य की तपस्या से उत्पन्न हुई थी। मवई ब्लाक के लखनीपुर के पास ऋषि तपस्या करते थे। लखनीपुर बसौढ़ी से निकली नदी अयोध्या में 151 किमी की यात्रा करके बेनवा के पास से पड़ोसी जिले अंबेडकरनगर में प्रवेश करती है।
डेढ़ से पांच मीटर तक खोदी गई नदी
पौराणिक तमसा को नवजीवन देने के लिए डेढञ से पांच मीटर तक खोदाई की गई। मवई और रुदौली में इसकी खोदाई के लिए चार से पांच मीटर खोदा गया तो अमानीगंज, मिल्कीपुर, सोहावल, मसौधा, बीकापुर और तारून में एक से दो मीचर की खुदाई करनी पड़ी।
उद्गम स्थल मवई व रुदौली में लुप्तप्राय हो गई थी तमसा
तमसा अपने उद्गम स्थल मवई और रूदौली के लगभग 25 किमी में लुप्तप्राय हो गई थी। यहां नदी को पाटकर खेती की जा रही थी। कुछ स्थानों पर तो नदी में मकान खडे कर लिए गए थे। इसे खाली कराने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। फिलहाल अब तमसा की तस्वीर बदल गई है। इसके किनारे पर खेड़े होने पर स्वत: शांति की अनुभूति होती है। अमूमन 35 से 40 मीटर में फैलाव में खोदी गई नदी को मवई और रुदौली के कुछ में स्थानों पर लगभग 10 मीटर ही फैलवा मिल सका।
दो नदियों के आपस में जोड़ने का खाका
तमसा को सदानीरा बनाने के लिए कल्याणी नदी से मिलन का खाका भी खींचा गया है। यह नदीं से कुछ किमी पर बहती है। इसको लेकर कार्रवाई शुरू की गी थी लेकिन अभी यह काम पूर्ण होना नहीं बताया गया है।
भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय ने तमसा नदी को नेशनल वाटर अवार्ड-2019 के प्रथम पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की है। यह पुरस्कार तमसा के पुनरूद्धार की परियोजना को लेकर दिए जाने की घोषणा की गई है। इसके लिए जल शक्ति मंत्रालय ने अलग से कुछ सूचनाएं भी मांगी है।
- नागेंद्र मोहन राम त्रिपाठी, उपायुक्त मनरेगा