भेलसर। कोविड- 19 के चलते नगर में न तो ईद-ए-मिलाद-उल-नबी पर जुलूस निकलेगा और न ही सजावट की जाएगी। यानी इस बार जश्न नहीं मनेगा। सादगी के संग जयंती मनेगी। रुदौली नगर के मौलाना अरसद कासमी ने बताया कि इस्लामी कैलेंडर के अनुसार पैगंबर हजरत मुहम्मद का जन्म रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख 11 नवंबर 569 ईस्वी की सुबह अरब के मक्का मुअज्जमा में हुआ था। 53 वर्ष की उम्र तक वे मक्का में रहे इसके बाद मदीना मुनव्वरा चले गए। दस साल तक वे वहीं रहे, 63 साल की उम्र में उनका देहावसान हुआ।
वे सादगी की मिसाल थे और उन्होंने अपने जीवन में कभी अपने जन्म दिन का जश्न नहीं मनाया। मगर उनके देहावसान के बाद 11 वीं सदी में मिस्र से यह परम्परा शुरु हुई। आज भारत में भी इस दिन को ईद-ए-मिलाद के रुप में श्रद्धा से मनाया जाता है। इस दिन मस्जिदें रोशन की जाती हैं और जुलूस निकाले जाते है। खास इबादतें होती हैं। लेकिन इस बार कोरोना महामारी को देखते हुए रुदौली की कोई भी अंजुमन सजावट का कार्य नहीं करेंगी और न ही कोई जुलूस निकाला जाएगा।
उन्होंने कहा कि इस्लाम अमन का पैगाम देता है। दुनिया में कोई ऐसा मजहब नहीं है जो इंसानों को बांटने का हुक्म देता हो। दुनिया के सभी मजहब अमन व सुकून का ही पैगाम देता है। उन्होंने कहा कि इंसानियत और मानवता का पाठ इस्लाम मजहब सिखाता है। आज के परिवेश में इंसानियत को गले लगाना चाहिए। इससे आपस में भाईचारा और प्रेम की भावना को बढ़ावा मिलता है। हमारे नबी ने एकता का संदेश दिया है।
यह दिन याद दिलाता है कि ईश्वर ने जिस मानव धर्म की रचना की, क्या हम उसका सही मायनों में अनुसरण कर रहे हैं? पैगंबर साहब ने करीब एक लाख लोगों के काफिले के साथ जो आखरी बार हज किया था, उसे हज्जतुल विदा कहा जाता है। इंतकाल के चार दिन पूर्व दोपहर की नमाज के वक्त उन्होंने लोगों से मिल-जुलकर रहने और उनके अल्लाह के घर जाने की तैयारी करने की हिदायत दी। इंतकाल से पहले दान से प्राप्त अशरफियां उन्होंने गरीबों में बंटवा दीं, 8 जून 632 ईस्वी को उनका इंतकाल हो गया।